आज 7 जून को निर्जला एकादशी का व्रत है। निर्जला एकादशी हिंदू धर्म में एक विशेष और कठिन व्रत माना जाता है। यह व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आता है, जब भीषण गर्मी का समय होता है और पानी का महत्व सबसे अधिक होता है। इस दिन बिना अन्न और जल के रहकर भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं, बल्कि श्रद्धा और सेवा का भी प्रतीक है। इस व्रत का उद्देश्य भगवान विष्णु को प्रसन्न करना और उनके चरणों में श्रद्धा अर्पित करना है। यह एकादशी विशेष रूप से उन भक्तों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो वर्षभर की सभी एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते। उन्हें इस एक दिन के कठिन व्रत से पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त हो जाता है।
निर्जला एकादशी का उल्लेख और इसकी उत्पत्ति महाभारत काल से जुड़ी है। कथा के अनुसार, कुंतीपुत्र भीम वर्षभर की एकादशियों का व्रत नहीं रख पाते थे, क्योंकि उन्हें भूख सहन नहीं होती थी। तब महर्षि वेदव्यास ने उन्हें साल में केवल एक बार निर्जल व्रत रखने की सलाह दी, जिससे सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि इस दिन व्रत, दान-पुण्य और भगवान विष्णु की उपासना से मोक्ष की प्राप्ति होती है। भीम ने पूरे संकल्प और शक्ति के साथ यह व्रत रखा। गर्मी और प्यास के बावजूद वे डटे रहे। उनकी आस्था से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें आशीर्वाद दिया। तभी से यह एकादशी ‘भीम एकादशी’ और ‘निर्जला एकादशी’ के नाम से जानी जाती है।
हजारों वर्षों बाद भी यह परंपरा आज जीवित है। इस दिन भक्त सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं, व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन न अन्न ग्रहण करते हैं, न जल। यह कठिन व्रत भक्तों की तपस्या और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का प्रतीक है। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व है। जल से भरे घड़े, वस्त्र, पंखे, शरबत आदि वस्तुएं जरूरतमंदों को दान में दी जाती हैं। यह परंपरा हमें केवल आत्मसंयम का मार्ग नहीं दिखाती, बल्कि दूसरों की सेवा करने की भी प्रेरणा देती है। आज जब हम यह व्रत रखते हैं, तो केवल भूखा रहने के लिए नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म से शुद्ध होने की मिसाल पेश करते हैं। निर्जला एकादशी का सच्चा अर्थ ही स्वयं के संकल्प और सेवा के उत्सव से जुड़ा है।