मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में पर्यटन विकास का दायरा अब अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे प्रमुख केंद्रों से आगे बढ़कर अल्पज्ञात लेकिन समृद्ध विरासत वाले स्थलों तक पहुंच रहा है। धार्मिक, ऐतिहासिक, साहित्यिक और प्राकृतिक महत्व वाले ऐसे स्थलों को पर्यटन की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए काम किया जा रहा है।
वर्ष 2021-22 से 2025-26 के बीच प्रदेश के 35 जिलों में 97 अल्पज्ञात स्थलों पर करीब 1,425 करोड़ रुपये की परियोजनाएं शुरू की गई हैं। सरकार का लक्ष्य इन स्थलों को बेहतर सुविधाओं, संरक्षण और आधुनिक प्रस्तुति के जरिए पर्यटन मानचित्र पर प्रमुख पहचान दिलाना है।
बटेश्वर में 200 करोड़ से ज्यादा की परियोजनाएं
आगरा के बटेश्वर में 9 परियोजनाओं पर 200 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे हैं। यमुना किनारे बसे इस प्राचीन मंदिर क्षेत्र का संबंध पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पैतृक जड़ों से भी है।
यहां मंदिर परिसर, विरासत संरक्षण, कुंड, घाट, रोशनी और पर्यटक सुविधाओं के साथ पूरे क्षेत्र के समेकित विकास पर काम हो रहा है। इससे आगरा आने वाले पर्यटकों को प्रमुख स्मारकों के अलावा दूसरे ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंचाने की तैयारी है।
काशी में चंद्रावती और लमही को नई पहचान
वाराणसी में काशी विश्वनाथ और गंगा घाटों से आगे पर्यटन का विस्तार किया जा रहा है। 17 करोड़ रुपये से अधिक की चंद्रावती परियोजना के जरिए आठवें जैन तीर्थंकर चंद्रप्रभु के जन्मस्थान को विकसित किया जा रहा है।
वहीं, लमही में प्रसिद्ध साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद के पैतृक घर को संग्रहालय का रूप दिया जा रहा है। इससे वाराणसी की पहचान धार्मिक पर्यटन के साथ हिंदी-उर्दू साहित्य की विरासत से भी जुड़ेगी।
पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के अनुसार, मथुरा में कृष्ण तीर्थ के साथ जोधपुर झाल के संरक्षण और इको टूरिज्म विकास की तैयारी है। प्रयागराज में श्रृंगवेरपुर के निषादराज पार्क के जरिए भगवान राम और निषादराज के संबंध को पर्यटन की नई कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
जायस से चित्रकूट तक विरासत पर जोर
अमेठी में करीब 35 करोड़ रुपये की तीन परियोजनाओं के जरिए जायस को गुरु गोरखनाथ की तपोस्थली और मलिक मोहम्मद जायसी की साहित्यिक विरासत से जोड़ा जा रहा है।

तुलसीदास जन्मस्थान, चित्रकूट
चित्रकूट में रामघाट और कामदगिरि से आगे लालापुर स्थित महर्षि वाल्मीकि आश्रम, राजापुर में तुलसीदास की जन्मस्थली और गणेश बाग के पास श्रीराम वाटिका इको पार्क को विकसित किया जा रहा है।

परमहंस योगानन्द जन्मस्थली, गोरखपुर
इसी तरह बलिया में महर्षि भृगु आश्रम, चंदौली में बाबा कीनाराम अघोर पीठ और गोरखपुर में परमहंस योगानंद की जन्मस्थली को पर्यटन मानचित्र पर प्रमुखता दी जा रही है। योगानंद की जन्मस्थली के लिए करीब 47 करोड़ रुपये की दो परियोजनाएं ली गई हैं।
बौद्ध और प्रकृति पर्यटन पर भी फोकस
महाराजगंज में रामग्राम और देवदह जैसे बौद्ध इतिहास से जुड़े स्थलों को विकसित किया जा रहा है। सरकार का प्रयास है कि बौद्ध पर्यटन केवल सारनाथ, कुशीनगर और श्रावस्ती जैसे स्थापित केंद्रों तक सीमित न रहे।

महोबा में गोरखगिरी पहाड़ी और सूर्य मंदिर इंटरप्रिटेशन सेंटर के जरिए योग परंपरा, पुरातत्व और खगोलीय ज्ञान को पर्यटन से जोड़ा जा रहा है। सूर्य मंदिर परिसर में प्रस्तावित तारामंडल बच्चों और परिवारों के लिए विरासत और खगोल विज्ञान को समझने का नया माध्यम बनेगा।
कन्नौज के गुगरापुर में 81.35 लाख रुपये की च्यवन ऋषि आश्रम परियोजना के जरिए ऋषि परंपरा, आयुर्वेद और च्यवनप्राश से जुड़ी कहानी को पर्यटन से जोड़ने की तैयारी है।
स्थानीय लोगों के सुझावों से तैयार हो रहीं परियोजनाएं
मुख्यमंत्री पर्यटन विकास सहभागिता योजना के तहत सांसद, विधायक, स्थानीय निकाय, ट्रस्ट, संस्थान और अन्य पात्र लोग अपने क्षेत्र के धार्मिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों के विकास का प्रस्ताव दे सकते हैं।
25 लाख से 5 करोड़ रुपये तक की परियोजनाओं में पर्यटन विभाग पात्र लागत की 50 प्रतिशत तक सहायता दे सकता है। बड़ी परियोजनाएं राज्य की पर्यटन योजनाओं के तहत ली जाती हैं। इससे छोटे और कम चर्चित स्थलों को भी विकास की मुख्यधारा में आने का अवसर मिल रहा है।
नैमिषारण्य में वेदारण्यम परियोजना
सीतापुर के नैमिषारण्य में 14.09 करोड़ रुपये की वेदारण्यम परियोजना भी इसी सोच का हिस्सा है। यहां ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद से जुड़े अलग-अलग अनुभव क्षेत्र विकसित किए जाएंगे। इनमें औषधीय पौधे, योग, ध्यान, संगीत और पारंपरिक शिक्षा को शामिल किया जाएगा।
पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की पर्यटन पहचान केवल पहले से प्रसिद्ध स्थलों तक सीमित नहीं रह सकती। हर जिले में ऐसे स्थान हैं, जिनका स्थानीय लोगों, परंपराओं और इतिहास से गहरा संबंध है।
पर्यटन के साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे
जयवीर सिंह ने कहा कि इन प्रयासों से लोगों को अपनी जड़ों और विरासत पर गर्व मिलेगा और पर्यटन का लाभ बड़े केंद्रों से बाहर भी पहुंचेगा। गाइड, कारीगर, परिवहन संचालक, होटल, होमस्टे और छोटे स्थानीय कारोबार इससे जुड़ सकेंगे।
उन्होंने कहा कि बटेश्वर, जायस, लालापुर, राजापुर, रामग्राम, गोरखगिरी, चंद्रावती, लमही और गुगरापुर जैसे स्थल अपने-अपने जिले की अलग पहचान और कहानी सामने लाते हैं। सरकार का प्रयास है कि बेहतर सुविधाओं, संरक्षण और आधुनिक प्रचार के जरिए इन स्थलों को यात्रियों तक पहुंचाया जाए।
अपर मुख्य सचिव पर्यटन, संस्कृति एवं धर्मार्थ कार्य विभाग अमृत अभिजात ने कहा कि किसी स्थल को पर्यटन केंद्र बनाने के लिए केवल निर्माण कार्य पर्याप्त नहीं है। वहां पहुंच, सुविधाओं और उस स्थान की कहानी को पर्यटकों तक पहुंचाना भी जरूरी है। इसके लिए डिजिटल जानकारी, मैपिंग, थीम आधारित यात्रा मार्ग, QR आधारित जानकारी और कई भाषाओं में सामग्री पर जोर दिया जा रहा है।