नयी दिल्ली, 17 जून (भाषा) नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत 2017 से अब तक गंगा में 205 लाख से अधिक ‘फिश फिंगरलिंग’ (मत्स्य पालन के लिए जल स्रोत में छोड़े जाने वाले मछली के छोटे बच्चे) छोड़ी गई हैं।
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने मछलियों को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़े जाने को गंगा के पारिस्थितिक पुनरुद्धार की आधारशिला बताया है।
एनएमसीजी ने कहा कि देशी मछली प्रजातियों की आबादी को पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से चलाए जा रहे एक कार्यक्रम के तहत रोहू, कतला और मृगल समेत 205 लाख से अधिक ‘फिंगरलिंग’ को नदी में छोड़ा गया है।
इस सप्ताह की शुरुआत में ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में मिशन ने कहा, ‘‘गंगा का पुनरुद्धार डॉल्फिन से शुरू नहीं हुआ। इसकी शुरुआत उस चीज से हुई जिसे डॉल्फिन खाती है। दशकों तक नदी की खाद्य श्रृंखला कमजोर और खोखली होती चली गई। वे देशी मछलियां, जो डॉल्फिन का भोजन थीं और मछुआरों की आजीविका का आधार थीं, गायब हो चुकी थीं।’’
मछली छोड़ने का यह कार्यक्रम ‘नमामि गंगे’ पहल के तहत आईसीएआर–केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (आईसीएआर-सीआईएफआरआई) द्वारा संचालित किया जा रहा है।
आईसीएआर–सीआईएफआरआई ने गंगा और उसकी सहायक नदियों के पारिस्थितिकीय रूप से महत्वपूर्ण हिस्सों में 170 से अधिक ‘रिवर रैंचिंग’ कार्यक्रम आयोजित किए हैं, जिनमें देशी मछली प्रजातियों के बीज छोड़े गए हैं।
एनएमसीजी के अनुसार, ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम देशी मछली प्रजातियों को नदी में छोड़कर ‘अंदर से खाद्य श्रृंखला को पुनर्निर्मित’ कर रहा है।
मिशन ने कहा, ‘‘हर ‘फिंगरलिंग’ एक साथ दो काम करती है। यह उस नदी को पोषण देती है, जिसे जीवित कहलाने के लिए एक पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता होती है। और यह उस मछुआरे को भी सहारा देती है, जिसे अपने पेशे के लिए मछलियों से भरा हुआ जाल चाहिए।’’
भाषा
देवेंद्र अविनाश
अविनाश