नयी दिल्ली, 16 जून (भाषा) उत्तराखंड में देहरादून के एक गांव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कार्यकर्ता की हत्या को लेकर भड़की हिंसा के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद (एमएम) के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मामले की निष्पक्ष व पारदर्शी जांच कराने की मंगलवार को मांग की।
संगठन की ओर से जारी एक बयान के मुताबिक, मदनी ने गृह मंत्री को पत्र लिखकर इलाके में सांप्रदायिक हिंसा और घृणित भाषणों पर तत्काल रोक लगाने व भय के कारण पलायन करने वाले परिवारों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने की भी मांग की है।
मदनी ने देहरादून जिले के विकासनगर क्षेत्र के बैरागीवाला गांव में हुई हत्या और उसके बाद उत्पन्न परिस्थितियों पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति की हत्या एक गंभीर अपराध और मानवता के विरुद्ध कृत्य है, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है।
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ शरारती और सांप्रदायिक तत्वों ने इस घटना के बाद क्षेत्र में नफरत फैलाने और लोगों को बांटने का काम किया है।
देहरादून के बैरागीवाला गांव में हुई झड़प में शनिवार को भाजपा के 44 वर्षीय स्थानीय पदाधिकारी की हत्या कर दी गई। इस मामले में पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया है।
अधिकारियों ने बताया कि हत्या के बाद रविवार सुबह बैरागीवाला गांव में हिंसा भड़क गई और कथित तौर पर पुलिसकर्मियों एवं आरोपियों की संपत्ति को निशाना बनाया गया।
जमीयत के बयान के मुताबिक, हिंसा को लेकर मदनी ने शाह को एक विस्तृत पत्र भेजा है जिसमें हत्या के मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराने, दोषियों को कठोर सज़ा दिलाने, सांप्रदायिक हिंसा, घृणित भाषणों और उकसावे वाली गतिविधियों पर तत्काल रोक लगाने की मांग की गई है।
मदनी ने पत्र में शाह से भय के कारण पलायन करने वाले परिवारों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने, प्रभावित क्षेत्रों में शांति एवं सांप्रदायिक सौहार्द बहाल करने के लिए प्रभावी कदम उठाने, आगजनी, तोड़फोड़ और धार्मिक स्थलों पर हुए हमलों की स्वतंत्र जांच कराने तथा प्रभावित परिवारों को उनके नुकसान का उचित मुआवज़ा देने की मांग की है।
उन्होंने साथ ही मृतक के परिजनों को भी मुआवज़ा देने की मांग की है।
बयान के मुताबिक, शाह को भेजे गए पत्र की प्रतियां उत्तराखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक तथा देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को भी भेजी गई हैं।
राज्यसभा के पूर्व सदस्य ने इस बात पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि आरोपी के मकान पर कानूनी प्रक्रियाओं तथा निर्धारित न्यायिक एवं प्रशासनिक प्रक्रिया को पूरा किए बिना केवल ‘सांप्रदायिक दबाव’ के तहत बुलडोज़र कार्रवाई की गई।
उन्होंने कहा, “इस प्रकार की कार्रवाइयां भारतीय संविधान, कानून के शासन और न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध हैं। भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है, जहां सज़ा का निर्धारण अदालतें करती हैं, न कि उग्र भीड़ या जनाक्रोश। कानून से परे उठाया गया कोई भी कदम न केवल न्याय की भावना को आहत करता है, बल्कि जनता के कानूनी व्यवस्था पर विश्वास को भी कमजोर करता है।”
भाषा नोमान नोमान शफीक
शफीक