Breaking News

कश्मीर के गुलमर्ग में LOC के पास रहस्यमयी ब्लास्ट, 1 शख्स की मौत, 4 घायल     |   दिल्ली-NCR से कश्मीर तक 6.2 तीव्रता से कांपी धरती, अफगानिस्तान बना भूकंप का केंद्र     |   दिल्ली-NCR और जम्मू-कश्मीर में महसूस किए गए भूकंप के तेज झटके     |   राम मंदिर ट्रस्ट में बड़े बदलाव की तैयारी, 11 जुलाई की बैठक में नए महासचिव पर फैसला संभव     |   राम मंदिर ट्रस्ट से चंपत राय-अनिल मिश्रा का इस्तीफा, बैठक में तय होगी अगली भूमिका     |  

अरुणाचल में धर्म स्वतंत्रता कानून लागू करने का पीपीए और मानवाधिकार संगठन ने किया विरोध

ईटानगर, 14 जून (भाषा) अरुणाचल प्रदेश की क्षेत्रीय पार्टी ‘पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल’ (पीपीए) ने अरुणाचल प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए) को लागू किए जाने का कड़ा विरोध करते हुए राज्य सरकार से इस मुद्दे पर चर्चा के लिए विधानसभा का विशेष सत्र तत्काल बुलाने की मांग की है।

पीपीए अध्यक्ष नाबाम विवेक ने शनिवार को बताया कि पार्टी ने 11 जून को हुई अपनी राज्य कार्यकारिणी की बैठक में इस कानून के विरोध में औपचारिक प्रस्ताव पारित किया। उन्होंने बताया कि बैठक में पार्टी के प्रदेश पदाधिकारी और विभिन्न प्रकोष्ठों के प्रमुखों ने हिस्सा लिया था।

सेवानिवृत्त न्यायाधीश बी.पी. काटेकी की अध्यक्षता वाली एक उच्चस्तरीय समिति ने आठ जून को इस कानून के मसौदा नियम राज्य सरकार को सौंपे थे। यह कानून वर्ष 1978 में पारित किया गया था, लेकिन परिचालन नियम नहीं बनने के कारण अब तक लागू नहीं हो सका था। यह अधिनियम बल, प्रलोभन या धोखाधड़ी के जरिए धर्म परिवर्तन पर रोक लगाने का प्रावधान करता है।

विवेक ने कानून के मसौदा नियमों के तहत धार्मिक जनसांख्यिकीय आंकड़े एकत्र किए जाने के सरकार के उद्देश्य पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा, ‘‘सरकार नागरिकों के धर्म संबंधी आंकड़ों का क्या करेगी? कोई व्यक्ति सिख, बौद्ध, ईसाई या हिंदू धर्म का पालन करता है, इसका रिकॉर्ड रखने का प्रशासनिक दृष्टि से कोई औचित्य नहीं है।’’

उन्होंने कहा कि वर्ष 2026 में यह कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुका है और इसे लागू करने से राज्य की सामाजिक सद्भावना, जनजातीय पहचान और शांति प्रभावित हो सकती है।

विवेक ने कहा, ‘‘यह कानून न तो जनजातीय पहचान की रक्षा करेगा और न ही किसी व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने से रोक सकेगा। इसके विपरीत, इसके लागू होने से परिवारों और जनजातियों के भीतर धार्मिक आधार पर मतभेद और तनाव पैदा होने का खतरा है।’’

उन्होंने कहा कि अरुणाचल प्रदेश हमेशा शांतिप्रिय राज्य रहा है और पार्टी लोकतांत्रिक तथा विधायी प्रक्रियाओं के माध्यम से इस कानून का विरोध जारी रखेगी।

इस बीच, मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स ऑफ अरुणाचल (एचआरए) ने भी राज्य सरकार और सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से एपीएफआरए-1978 को लागू करने संबंधी उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों पर पुनर्विचार करने और उन्हें खारिज करने की मांग की है।

एचआरए ने रविवार को मुख्यमंत्री पेमा खांडू को सौंपे ज्ञापन में कहा कि यदि यह कानून लागू किया गया तो इसके गंभीर सामाजिक परिणाम हो सकते हैं।

संगठन ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की परंपरा के लिए जाना जाता है और दशकों पुराने इस कानून को लागू करने से राज्य की शांति, भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंच सकता है।

ज्ञापन में कहा गया, ‘‘हमारे विचार में एपीएफआरए का कार्यान्वयन न तो राज्य के लोगों और न ही सरकार के लिए कोई महत्वपूर्ण लाभ लेकर आएगा। इसके बजाय यह विभिन्न समुदायों के बीच गलतफहमी पैदा कर सकता है और लोगों को बांट सकता है।’’

संगठन ने उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों की आलोचना करते हुए दावा किया कि ये राज्य की बड़ी आबादी की वास्तविक चिंताओं और आकांक्षाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं करतीं तथा इससे सामाजिक ताने-बाने पर अनपेक्षित प्रभाव पड़ सकते हैं।

भाषा राखी अमित

अमित