(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 12 जून (भाषा) भारत के सर्वश्रेष्ठ पिस्टल निशानेबाजों में से एक और मनु भाकर को पेरिस ओलंपिक में दो कांस्य पदक दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले जसपाल राणा का दिल से संबंधित बीमारी के कारण शुक्रवार तड़के निधन हो गया। वह 49 वर्ष के थे।
राणा के परिवार में उनकी पत्नी रीना राणा, बेटी देवांशी, बेटा युवराज, पिता नारायण सिंह राणा और उनकी बहन सुषमा सिंह और छोटा भाई सुभाष राणा शामिल हैं।
भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ (एनआरएआई) के अध्यक्ष कलिकेश नारायण सिंह देव के अनुसार राणा ने देर रात को दिल्ली के मैक्स सुपर स्पेश्यलिटी अस्पताल में अंतिम सांस ली।
मैक्स के समूह चेयरमैन (कार्डियक साइंसेस, पैन मैक्स, इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी और इलेक्ट्रोफिजियोलॉजी प्रमुख) डॉक्टर बलबीर सिंह ने कहा कि राणा को एक जून को नाजुक हालत में अस्पताल लाया गया था ।
उन्होंने कहा ,‘‘ जसपाल राणा को तीन दिन पहले दिल का तेज दौरा पड़ा था। वे यात्रा कर रहे थे और अस्पताल पहुंचने से पहले उन्हें सीने में दर्द हो रहा था, उनकी हालत बहुत नाजुक थी।’’
उन्होंने कहा ,‘‘ दिल के दौरे का कारण बनी धमनी पूरी तरह से अवरूद्ध थी । उनके दिल की पंपिंग काफी कमजोर हो गई थी और उन्हें दिल का दौरा पड़ा था ।’’
अस्पताल ने कहा कि राणा उपचार से ठीक हो रहे थे लेकिन अचानक उनकी हालत बहुत बिगड़ गई ।
डॉक्टर सिंह ने कहा ,‘‘ मिस्टर राणा की हालत में काफी सुधार हुआ था और वह आज अस्पताल से छुट्टी के लिए फिट थे। लेकिन बदकिस्मती से सोते समय अचानक उनका दिल फट गया, जिससे उनकी मौत हो गई।
राणा के असमय निधन से भारतीय निशानेबाजी जगत सदमे में है । उनका अंतिम संस्कार शनिवार को वाराणसी में होगा ।
राणा भारतीय पिस्टल निशानेबाजों के लिए ‘हाई परफार्मेंस कोच’ के रूप में कार्यरत थे।
वह हाल में जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित आईएसएसएफ विश्व कप से भारतीय दल की वापसी की उड़ान के दौरान बीमार पड़ गए थे और उन्हें एक चिकित्सा प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था।
नयी दिल्ली में उतरते ही उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया और उन्हें स्टेंट डाले गए थे।
अपने मुखर स्वभाव, बेबाक टिप्पणी करने और खेल के प्रति जुनून के कारण भारतीय निशानेबाजी जगत में विद्रोही माने जाने वाले इस पूर्व निशानेबाज में असाधारण प्रतिभा थी और उन्होंने महज 12 साल की उम्र में राष्ट्रीय स्तर का अपना पहला स्वर्ण पदक जीता था।
1994 के राष्ट्रमंडल और एशियाई खेलों में 25 मीटर पिस्टल में स्वर्ण पदक जीतना उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहली बड़ी सफलता थी।
दरअसल एशियाई खेलों का उनका स्वर्ण पदक राजा रणधीर सिंह के 1978 में सोने का तमगा जीतने के 16 साल बाद भारत का पहला स्वर्ण पदक था। रणधीर सिंह का हाल ही में वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से जूझने के बाद निधन हो गया था।
एक निशानेबाज के रूप में राणा के करियर का सबसे बड़ा क्षण 2006 के दोहा एशियाई खेलों में आया जब उन्होंने तीन स्वर्ण पदक और एक रजत पदक जीता, जिसमें उस समय के विश्व रिकॉर्ड की बराबरी करना भी शामिल था।
एक उत्कृष्ट निशानेबाज के रूप में शानदार करियर के बाद राणा जूनियर राष्ट्रीय टीम के कोच और ‘हाई परफॉर्मेंस कोच’ के रूप में अपनी भूमिकाओं से भारतीय निशानेबाजी में बदलाव लेकर आए।
कोच के रूप में उनकी सबसे बड़ी सफलता पेरिस में 2024 में खेले गए ओलंपिक खेलों में मनु भाकर को दो कांस्य पदक जीतने में मदद करना था।
वह 2012 से जूनियर पिस्टल कोच थे और उनकी देखरेख में ही सौरभ चौधरी, अनीश भानवाला और चिंकी यादव जैसे निशानेबाज उभर कर सामने आए थे। उन्होंने जूनियर स्तर पर अभूतपूर्व कार्य करके कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी तैयार किये।
एनआरएआई ने पिछले साल फरवरी में उन्हें आधिकारिक तौर पर 25 मीटर पिस्टल स्पर्धा के लिए हाई-परफॉर्मेंस कोच के रूप में नियुक्त किया था। उन्होंने कोचिंग के नए मानदंड स्थापित किए थे।
खेल में उनके अपार योगदान और निशानेबाजों की अगली पीढ़ी को तैयार करने में योगदान देने के लिए सरकार ने उन्हें 2020 में प्रतिष्ठित द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया था।
राणा ने राष्ट्रमंडल खेलों में चार बार भाग लिया और कल 15 पदक हासिल किया जिसमें नौ स्वर्ण पदक भी शामिल हैं। वह राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी हैं।
भाषा पंत मोना मोना
मोना