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अहमदाबाद विमान हादसे के बाद तेजी से चिकित्सकीय जरूरतों का समन्वय किया गया

(कावेरी माढक)

अहमदाबाद, 10 जून (भाषा) अहमदाबाद में एअर इंडिया के विमान की दुर्घटना में 260 लोगों की जान जाने के एक साल बाद, अधिकारियों ने याद किया कि कैसे एक अकल्पनीय स्थिति के बीच, शहर में सबसे बड़ी आपातकालीन कार्रवाई की गई, चिकित्सा जरूरतों का तेजी से समन्वय किया गया और ट्रॉमा टीमों को तैयार किया गया।

इस हादसे के बाद कई लोग इतनी बुरी तरह जल गए थे कि उनके शवों से पहचान नहीं हो पा रही थी। ऐसे में अधिकारियों ने डीएनए मिलान को ही एकमात्र भरोसेमंद तरीका माना, जिसमें फोरेंसिक टीम अन्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर लगातार काम करती रहीं और उन्होंने मृतकों के शवों के सम्मान का भी ध्यान रखा।

अहमदाबाद सिविल अस्पताल में दुखी परिवारों की मदद करने के लिए बड़ी संख्या में एनजीओ और स्वयंसेवी संगठनों के लोग जमा हो गए थे।

अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक राकेश जोशी ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि चिकित्सकों, स्वास्थ विभाग, पुलिस, एनजीओ, राहत दलों और दमकल विभाग के संयुक्त प्रयासों की वजह से, कम समय में स्थिति को क्रमबद्ध तरीके से संभाल लिया गया।

उन्होंने कहा कि दुर्घटना के कुछ ही घंटों के अंदर, मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, गृह मंत्री हर्ष संघवी और स्वास्थ्य मंत्री ऋषिकेश पटेल अस्पताल पहुंच गए थे और उन्होंने व्यवस्थाओं की समीक्षा की।

पिछले साल 12 जून को, लंदन जाने वाली एअर इंडिया की उड़ान संख्या एआई-171 सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद मेघानीनगर इलाके में बीजे मेडिकल कॉलेज के छात्रावास परिसर में दुर्घटनाग्रस्त हो गई। हादसे में विमान में सवार 241 लोगों समेत 260 लोगों की मृत्यु हो गई।

जोशी ने याद किया, ‘‘हमने कभी सोचा भी नहीं था कि हम अपनी जिंदगी में ऐसा कुछ देखेंगे।’’

वह हादसे की पहली सूचना के समय बच्चों की एक जटिल सर्जरी में लगे थे। उन्होंने बताया कि विमान हादसे का पता चलते ही डॉक्टरों के ग्रुप्स में संदेश भेजे गए, आपातकालीन दवाओं का इंतज़ाम किया गया, ब्लड बैंकों को सूचित किया गया और ट्रॉमा टीमों को तैयार किया गया। जोशी ने कहा कि अस्पताल पहुंचने वाला पहला घायल व्यक्ति छात्रावास परिसर में काम करने वाला एक माली था।

उन्होंने बताया कि एक घंटे के अंदर, जलने, फ्रैक्चर और ट्रॉमा से पीड़ित लगभग 71 घायल अस्पताल में पहुंच गए थे।

जोशी के मुताबिक गंभीर मरीजों को तुरंत इलाज मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए सर्जन, न्यूरोसर्जन, फिजिशियन, एनेस्थेटिस्ट और आपातकालीन चिकित्सकों की विशेष टीमें तुरंत बनाई गईं।

जोशी ने कहा कि इसके बाद सबसे दिल दहला देने वाले दृश्य सामने आए जब मृतकों के जले हुए शव लाए जाने लगे।

उन्होंने कहा कि क्योंकि कई शवों को देखकर पहचाना नहीं जा सकता था, इसलिए डीएनए मिलान ही एकमात्र भरोसेमंद तरीका बन गया।

डॉ. धर्मेश पटेल समेत फोरेंसिक और चिकित्सा विशेषज्ञों की टीमों ने फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला आदि की मदद से लगातार डीएनए नमूना लेने, लेबलिंग और मैचिंग का काम शुरू कर दिया।

जोशी ने बताया कि 260 शवों में से 254 की पहचान डीएनए मिलान प्रणाली से हुई, जबकि छह लोगों की पहचान आधिकारिक तरीकों से कर ली गई।

उन्होंने बताया कि मनोविज्ञान विभाग के परामर्श दलों ने परेशान रिश्तेदारों को दिलासा देने के लिए लगातार काम किया।

उन्होंने कहा कि पहला डीएनए मिलान 48 घंटे के अंदर हो गया और परिवार को बता दिया गया कि वे अपनी सुविधा और समय पर शव ले लें।

अधिकारियों ने ससम्मान शवों को परिवारों को सौंपे जाने के लिए एक खास प्रोटोकॉल बनाया। जोशी ने कहा, 'पार्थिव शरीरों को ले जा रही एम्बुलेंस के साथ पुलिस और प्रशासन की पायलट गाड़ियां थीं, उनके पीछे रिश्तेदारों की गाड़ियां थीं, ताकि अंतिम संस्कार के दौरान भी कोई मुश्किल न हो।'

अधिकारी ने बताया कि डीएनए मिलान की पूरी प्रक्रिया 16 से 17 दिन में पूरी हो गई।

भाषा वैभव मनीषा

मनीषा