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होटल अग्निकांड: दिल्ली पुलिस का कर्मी बोला: '15 सेकंड और रुकता तो मैं मर गया होता'

नयी दिल्ली, पांच जून (भाषा) मालवीय नगर की पांच मंजिला इमारत में लगी भीषण आग के दौरान स्थानीय लोगों के साथ बिना किसी सुरक्षा उपकरण के अंदर घुसे दिल्ली पुलिस के जवानों ने डर और जल्दबाजी के पलों को याद किया और कहा कि उन्हें सिर्फ वे लोग दिखाई दे रहे थे जिन्हें बचाने की जरूरत थी।

हालांकि, उनके मन में एक मलाल अब भी है क्योंकि उनके सर्वोत्तम प्रयासों के बाद भी वे 'एक सीमित हद तक ही' कुछ कर सके, जबकि वे अंदर फंसे लोगों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें लगातार सुन रहे थे।

हेड कांस्टेबल दिनेश, देशराज, राजवीर और करतार बुधवार सुबह जब 'फ्लॉरिश स्टे बीएंडबी' आग लगी तो वह इमारत में पहुंचने वाले सबसे पहले लोगों में शामिल थे । इस हादसे में 12 विदेशी नागरिकों सहित 21 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए, जबकि कम से कम 58 लोगों को निकाला लिया गया।

पुलिस अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों के साथ मिलकर विशेष उपकरण के बिना ही बचाव प्रयास शुरू कर दिए थे।

पास की कुमार बस्ती में ड्यूटी पर तैनात दिनेश ने बताया कि घटना की सूचना मिलते ही उन्होंने तुरंत पुलिस वायरलेस नेटवर्क के जरिए वरिष्ठ अधिकारियों को सतर्क किया और मौके पर पहुंचे।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, 'जब मैं वहां पहुंचा, तो पूरा होटल धुएं से घिरा हुआ था। ऊपरी मंजिलों पर मौजूद लोग हाथ हिला रहे थे और मदद की गुहार लगा रहे थे। मुख्य रास्ता आग की लपटों से घिरा हुआ था और उनके बाहर आने का कोई रास्ता नहीं था।'

दिनेश ने बताया कि सुरक्षा उपकरणों के पहुंचने का इंतजार किए बिना उन्होंने पास से एक सीढ़ी का इंतजाम किया, दूसरी मंजिल पर चढ़े और कमरों के अंदर से धुएं को निकालने के लिए हथौड़े से खिड़की के शीशे तोड़ दिए।

उन्होंने बताया कि बचाव अभियान के दौरान उन्हें कई चोटें आईं।

उन्होंने कहा, 'मेरे हाथों, आंखों, पैरों और सिर पर कांच टूटने से चोटें आईं और मैं झुलस भी गया। लेकिन उस वक्त मैं सिर्फ यही सोच रहा था कि लोगों की जान कैसे बचाई जाए।'

दिनेश ने बताया कि वह एक खिड़की तोड़कर अंदर दाखिल होकर दूसरी मंजिल के एक कमरे में फंसी दो महिलाओं को बाहर निकालने में कामयाब रहे।

उन्होंने कहा, 'ऐसे पल भी आए जब मुझे लगा कि मैं भी नहीं बच पाऊंगा। लेकिन उस समय हमें सिर्फ वे लोग दिखाई दे रहे थे जिन्हें बचाने की जरूरत थी।'

हेड कांस्टेबल खुद भी बाल-बाल बचे।

उन्होंने बताया, 'अगर मैं 15 सेकंड और अंदर रुक जाता, तो मैं जिंदा बाहर नहीं आ पाता। मेरे नीचे उतरने के बमुश्किल 10 सेकंड बाद ही खिड़की के पास के बिजली के तारों में आग लग गई और भारी चिंगारियां निकलने लगीं।'

उन्होंने कहा, 'हमें अब भी यह मलाल है कि हम और लोगों को नहीं बचा सके। हम कई बार बेबस महसूस कर रहे थे। हम अंदर से चीखें सुन सकते थे, लेकिन हम एक सीमित हद तक ही कुछ कर सकते थे। हमने अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन जिन लोगों की जान चली गई, उन्हें लेकर हम अब भी खुद को दोषी महसूस करते हैं।'

स्थिति बिगड़ने पर पुलिस कर्मियों ने ऊपरी मंजिलों पर फंसे लोगों को बचाने के लिए नए-नए उपाय किए।

हेड कांस्टेबल देशराज ने बताया कि जब अधिकारियों को एहसास हुआ कि कई लोगों के पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है, तो उन्होंने पास की दुकानों से गद्दे इकट्ठा किए और उन्हें जमीन पर बिछा दिया।

उन्होंने कहा, 'हम उनसे कहते रहे कि डरो मत और कूद जाओ। कई लोग दूसरी, तीसरी और चौथी मंजिल से कूद गए। कुछ लोगों को चोटें आईं, लेकिन उनकी जान बच गई।'

राजवीर और करतार ने बताया कि होटल के आसपास की संकरी गलियों और भारी भीड़ ने बचाव प्रयासों में बाधा डाली और एम्बुलेंस की आवाजाही में देरी हुई।

भाषा नोमान नोमान माधव

माधव