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दिल्ली दंगे से जुड़े ‘बड़े षड्यंत्र’ मामले में आरोप तय करने पर उच्च न्यायालय ने अपनी रोक हटाई

नयी दिल्ली, पांच जून (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 के दंगों से संबंधित कथित बड़ी साजिश के मामले में आरोप तय करने पर लगी रोक शुक्रवार को हटा दी और मामले की सुनवाई कर रही अदालत को अंतिम आदेश पारित करने की अनुमति दे दी।

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने आरोपी देवांगना कलिता की याचिका को खारिज करते हुए रोक हटा दी। याचिका में, कलिता ने पुलिस को मामले से संबंधित कुछ वीडियो और व्हाट्सएप चैट उपलब्ध कराने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।

फैसला सुनाये जाने के बाद कलिता के वकील ने न्यायाधीश से अनुरोध किया कि रोक को फिलहाल जारी रखा जाए और कहा कि वह अपनी शिकायत के साथ उच्चतम न्यायालय का रुख करेंगी।

न्यायमूर्ति कृष्णा ने जवाब दिया, ‘‘मैं ऐसा नहीं कर पाऊंगा।’’

हालांकि, अदालत ने कलिता की एक अलग याचिका को स्वीकार कर लिया और उसे गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामले में अप्रयुक्त दस्तावेजों का अध्ययन करने की अनुमति दे दी।

कलिता ने 2023 में उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दावा किया था कि दिल्ली पुलिस ने फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को रिकॉर्ड करने के लिए कुछ व्यक्तियों को नियुक्त किया था और निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने पर बहस शुरू होने से पहले उन्हें फुटेज उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

उसने दावा किया था कि फुटेज से यह साबित होगा कि वह शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रदर्शन कर रही थी।

वीडियो फुटेज के अलावा, उसने एक समूह की ‘‘पूरी व्हाट्सऐप चैट’’ भी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। साथ ही, आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ‘‘चुनिंदा अंशों’’ का इस्तेमाल किया जा रहा है।

फैसले में अदालत ने कहा कि आरोपपत्र के साथ कलिता के खिलाफ सभी साक्ष्य, जिनपर अभियोजन पक्ष ने भरोसा जताया है, उन्हें कानून के अनुपालन में याचिकाकर्ता को पहले ही मुहैया कराया जा चुका है।

अदालत ने कहा कि इस तरह की बातचीत, सूचना, पुलिस अधिकारियों के ग्रुप चैट और व्हाट्सऐप समूह, जिनपर न तो भरोसा किया जा सकता है ना ही प्रासंगिक हैं। इन्हें साझा नहीं किया गया है क्योंकि इनमें संवेदनशील सूचना है या गोपनीय बातचीत है जिनका खुलासा नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा, ‘‘पुलिस अधिकारियों और उनकी गतिविधियों से संबंधित व्हाट्सऐप ग्रुप चैट आदि, जिन पर भरोसा नहीं जताया गया था, उन्हें सीआरपीसी की धारा 207 के तहत उपलब्ध कराना आवश्यक नहीं है।’’

निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का हवाला देते हुए, अदालत ने कलिता को उन साक्ष्यों का निरीक्षण करने की अनुमति दी जिन पर भरोसा नहीं किया गया था, और कहा कि न्यायिक कार्यवाही में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए, यहां तक ​​कि आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में भी।

अदालत ने 12 सितंबर 2024 को इस मामले में एक अंतरिम आदेश पारित किया था और निचली अदालत से कहा था कि वह आतंकवाद रोधी कानून यूएपीए के तहत कथित बड़े षड्यंत्र के मामले में आरोप तय करने के संबंध में अंतिम आदेश पारित न करे।

छात्र कार्यकर्ता कालिता, नताशा नरवाल, जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की सदस्य सफूरा जरगर, आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन और कई अन्य लोगों के खिलाफ भी उत्तर-पूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए दंगों के संबंध में विभिन्न प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। इन दंगों में 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

भाषा सुभाष नरेश

नरेश