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जब कानून लागू करने वाले ही जबरन वसूली करने लगें, तो नागरिक संदेह की नजर से देखने लगते हैं : न्यायालय

नयी दिल्ली, तीन जून (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने जबरन वसूली के आरोपी तीन पुलिस अधिकारियों को दी गई अग्रिम जमानत रद्द करते हुए कहा है कि जब कानून लागू करने वाले अधिकारी ही जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक संदेह की नजर से देखतें है और दुविधा में पड़ जाते हैं।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बंबई उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश को ‘‘अस्पष्ट’’ बताते हुए रद्द कर दिया।

पीठ ने कहा, ‘‘जब कानून लागू करने वाले अधिकारी जबरन वसूली करने वाले बन जाते हैं, तो नागरिक संदेह की नजर से देखने लगते हैं। विरोध करना तत्काल प्रतिशोध को न्योता देना है और एकमात्र विकल्प वर्दीधारी अधिकारियों के सामने चुपचाप आत्मसमर्पण करना है, भले ही स्पष्ट रूप से दुर्व्यवहार हो रहा हो।’’

इस मामले में, शिकायतकर्ता अपनी बेटी के साथ मुंबई से हापा दुरंतो एक्सप्रेस में यात्रा करने वाले थे। शिकायतकर्ता, उनकी बेटी और उन्हें छोड़ने आए एक करीबी रिश्तेदार को रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मियों ने हिरासत में ले लिया।

यात्री के सामान की तलाशी के दौरान 14 ग्राम की सोने की छड़ और 31,900 रुपये नकद बरामद हुए। आरोप है कि संतोषजनक स्पष्टीकरण देने के बावजूद, एक पुलिसकर्मी तीनों को पास के एक कमरे में ले गया, जहां उन्हें धमकाया गया और अपशब्द कहे गए। उन्हें सोने की छड़ के बदले नकद देने के लिए मजबूर किया गया।

शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी दर्ज कराई, जिसके बाद सत्र अदालत ने अधिकारियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी।

इस मामले में उच्च न्यायालय ने जांच के दौरान प्राप्त सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद तीनों अधिकारियों को अग्रिम जमानत दे दी थी।

भाषा शफीक सुरेश

सुरेश