नयी दिल्ली, 30 मई (भाषा) भारत में साल 2050 तक सिंचाई के लिए पानी की मांग बढ़कर 807 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीमएम) हो सकती है, जहाँ दुनिया की 17.5 प्रतिशत आबादी और 11.6 प्रतिशत पशुधन है। जल शक्ति मंत्रालय के अनुमानों में यह बात कही गई है।
मंत्रालय ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में होने वाले कुल पानी के इस्तेमाल का 80-90 प्रतिशत हिस्सा अकेले खेती (सिंचाई) में खर्च होता है, जिससे देश के जल संसाधनों पर दबाव और बढ़ता जा रहा है।
केंद्रीय जल आयोग के अध्ययन, ‘अंतरिक्ष इनपुट का उपयोग करके भारत में जल उपलब्धता का पुनर्मूल्यांकन, 2019’ के अनुसार, देश में हर साल औसतन करीब 3,880 बीसीएम वर्षा होती है। वाष्पीकरण और अन्य कारकों जैसे प्राकृतिक नुकसान को ध्यान में रखने के बाद वार्षिक जल की औसत उपलब्धता 1,999.20 बीसीएम होने का अनुमान है।
इस पृष्ठभूमि में, मंत्रालय ने ‘जल बजट’ तैयार करने की आवश्यकता पर बल दिया है। इसके अनुसार, भारत को आपूर्ति-संचालित दृष्टिकोण से हटकर मांग-आधारित और नियोजित जल प्रबंधन प्रणालियों की ओर बढ़ने की सख्त जरूरत है।
मंत्रालय ने कहा कि जल बजट, समुदायों को पानी की उपलब्धता और मांग का आकलन करने में सक्षम बनाता है, जिससे कृषि, घरेलू उपयोग, पशुधन और उद्योग जगत में सोच-समझकर निर्णय लेने में मदद मिलती है।
इसके अनुसार, जल संकट का सामना कर रहे उन क्षेत्रों में यह सतत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरा है, जहां पानी की कमी और इसका असमान वितरण आर्थिक स्थिरता, खाद्य सुरक्षा तथा जलवायु अनुकूलन के लिए खतरा पैदा करता है।
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प्रचेता नेत्रपाल
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