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नौ न्यायाधीशों की पीठ के फैसले का इंतजार करेंगे: पारसी महिला की याचिका पर न्यायालय ने कहा

नयी दिल्ली, 30 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह उस याचिका पर नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के फैसले का इंतजार करेगा, जिसमें नागपुर पारसी पंचायत को यह निर्देश देने का अनुरोध किया गया है कि वह किसी पारसी महिला के साथ उसके पुरुष समकक्षों के समान व्यवहार करे, भले ही वह किसी दूसरे धर्म के व्यक्ति से शादी कर ले।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने यह टिप्पणी दीना बुधराजा की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जो एक पारसी महिला हैं, जिन्होंने अपना धर्म बदले बिना एक हिंदू पुरुष से शादी की थी। उन्होंने याचिका में यह निर्देश देने का अनुरोध किया है कि उन्हें उनके प्रियजनों के निधन पर नागपुर के अगियारी में होने वाली प्रार्थनाओं में भाग लेने की अनुमति दी जाए।

बुधराजा को 2024 में उनकी दादी के अंतिम संस्कार के लिए एक अगियारी (पारसी धर्म का अग्नि मंदिर) में प्रवेश करने से मना कर दिया गया था।

नौ न्यायाधीशों की एक पीठ ने हाल ही में शबरिमला मंदिर सहित विभिन्न धर्मों की महिलाओं के खिलाफ कथित भेदभाव से संबंधित एक बड़े प्रश्न पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था और याचिकाकर्ता को परिणाम की प्रतीक्षा करने के लिए कहा।

पीठ ने 23 मार्च को धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के भीतर लैंगिक आधार पर भेदभाव से संबंधित एक महत्वपूर्ण संवैधानिक चुनौती की जांच करने का फैसला किया था, जिसमें यह सवाल उठाया गया था कि क्या एक पारसी महिला को अंतर-धार्मिक विवाह के बाद उसकी धार्मिक पहचान से वंचित किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने बुधराजा द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार, नागपुर पारसी पंचायत, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय, महाराष्ट्र सरकार और धर्मार्थ आयुक्त को नोटिस जारी किया।

वकील रोहित अनिल राठी के माध्यम से दायर याचिका में “नागपुर पारसी पंचायत के संविधान के नियम 5(2) को निरस्त करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है, क्योंकि यह भारत के संविधान का उल्लंघन करता है” और महिलाओं के साथ भेदभाव करता है।

याचिका में नागपुर पारसी पंचायत से यह घोषणा करने की भी मांग की गई कि उसे “पारसी पुरुषों और पारसी महिलाओं के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और एक पारसी महिला किसी अन्य धर्म के पुरुष से शादी करने के बाद भी पारसी बनी रहती है”।

भाषा प्रशांत दिलीप

दिलीप