चंडीगढ़, 30 मई (भाषा) पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो क्लिप कथित रूप से ‘रीट्वीट’ करने के मामले में शिक्षाविद् मधु पूर्णिमा किश्वर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है।
न्यायमूर्ति अमन चौधरी की पीठ ने शुक्रवार को कहा कि ‘‘रचनात्मक आलोचना करने और ट्रोल करने’’ के बीच अंतर है। अदालत ने कहा कि किश्वर के सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में फॉलोअर हैं, इसलिए इसके परिणाम व्यापक हो सकते हैं।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यह कोई ‘‘अकेली घटना’’ नहीं है और किश्वर पहले भी ‘‘संवेदनशील’’ मुद्दों पर पोस्ट साझा करती रही हैं।
चंडीगढ़ पुलिस ने सोशल मीडिया पर कथित रूप से फर्जी और भ्रामक सामग्री प्रसारित करने की शिकायत मिलने के बाद मानहानि एवं द्वेष को बढ़ावा देने तथा अन्य अपराधों के आरोप में किश्वर के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
किश्वर ने अपने वकीलों कपिल सिब्बल और सरताज सिंह नरूला के माध्यम से दलील दी कि उनके खिलाफ केवल यह आरोप है कि उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर 14 सेकंड की एक वीडियो क्लिप ‘रीट्वीट’ की थी, जो आपत्तिजनक नहीं थी और यह किसी दुर्भावना से साझा नहीं की गई थी।
याचिका के अनुसार, उनके खिलाफ जालसाजी का अपराध नहीं बनता, क्योंकि वीडियो उन्होंने तैयार नहीं किया था।
उनके वकीलों ने दलील दी कि किश्वर वरिष्ठ शिक्षाविद् हैं, उन्होंने कई पुस्तकें लिखी हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में उनके पिछली पोस्ट को आधार नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि उन पोस्ट को लेकर उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
वकीलों ने कहा कि किश्वर का उन टिप्पणियों पर कोई नियंत्रण नहीं है, जो अन्य लोग उनकी अपलोड की गई सामग्री या पोस्ट पर करते हैं, इसलिए उन्हें दूसरों के कृत्यों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि यह कहना गलत होगा कि किश्वर ने केवल ‘रीट्वीट’ किया था।
वकील ने कहा कि संबंधित वीडियो पहले किसी अन्य व्यक्ति ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर अपलोड किया था। इसके बाद किश्वर ने वीडियो डाउनलोड किया और उसे ‘एक्स’ पर अपलोड किया, जहां उनके 18 लाख फॉलोअर हैं।
वकील ने कहा, ‘‘वह वीडियो व्यापक रूप से प्रसारित हुआ और उसे 1,74,000 बार देखा गया। ... इस तरह उन्होंने न केवल गलत सूचना फैलाने में मदद की, बल्कि सरकार के प्रमुख की छवि को भी नुकसान पहुंचाया।’’
अदालत ने मामले में स्थिति रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को पहला नोटिस 20 अप्रैल को उनके दिल्ली स्थित पते पर विधिवत दिया गया था, लेकिन वह जांच एजेंसी के समक्ष पेश नहीं हुईं।
इसने कहा कि 26 अप्रैल और पांच मई के नोटिस के मामले में भी ऐसा ही हुआ जिससे जांच एजेंसी के साथ सहयोग न करने का उनका आचरण स्पष्ट होता है।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘जांच के दायरे में आया वीडियो प्रथम दृष्टया अन्य सोशल मीडिया मंचों पर अपलोड किया गया था, लेकिन तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता द्वारा अपनी टिप्पणियों के साथ वही वीडियो अपलोड किए जाने के बाद ही उसे 1,74,000 बार देखा गया।...’’
इसने कहा, ‘‘रचनात्मक आलोचना करने और बदनाम करने, संदेह पैदा करने एवं अप्रत्यक्ष रूप से आरोप लगाने के लिए ट्वीट करने/ट्रोल करने के बीच स्पष्ट अंतर है।’’
अदालत ने कहा, ‘‘ऐसे पोस्ट सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा सकते हैं, अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा दे सकते हैं और देश की एकता तथा अखंडता को खतरे में डाल सकते हैं।’’
इसने कहा कि अगर यह अकेली घटना होती तो इस पर अलग तरह से विचार किया जा सकता था लेकिन जैसा कि स्थिति रिपोर्ट में सामने आया है, वह पहले भी अलग-अलग ‘हैशटैग’ के साथ ‘‘भावनात्मक रूप से संवेदनशील’’ सामग्री/पोस्ट साझा करती रही हैं।
अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले के तथ्य और परिस्थितियां ऐसी हैं कि जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और कई पहलुओं का खुलासा होना बाकी है।
इसने कहा, ‘‘इसमें शामिल आपराधिकता की संभावना को इस स्तर पर खारिज करना बहुत जल्दबाजी होगी, इसलिए यह अदालत याचिकाकर्ता को अग्रिम जमानत की राहत देने के पक्ष में नहीं है। परिणामस्वरूप, यह याचिका खारिज की जाती है।’’
भाषा सिम्मी नेत्रपाल
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