नयी दिल्ली, 29 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि धीमी नौकरशाही प्रक्रियाओं के कारण राज्य किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती नहीं कर सकता है। इसके साथ ही शीर्ष न्यायालय ने उस व्यक्ति को 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया, जिसे अदालत द्वारा रिहाई का आदेश जारी किए जाने के बावजूद 24 दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया था।
न्यायमूर्ति संजय करोल और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ उस व्यक्ति की याचिका पर सुनवायी कर रही थी, जिसे दंगा और घर में अनधिकृत प्रवेश के आरोप में राजस्थान के अलवर की एक अदालत द्वारा चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनायी गई थी।
उस व्यक्ति ने तीन दिसंबर, 2023 को स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया था, लेकिन उसकी याचिका 18 जनवरी, 2024 को खारिज कर दी गई। बाद में उसने राजस्थान उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी।
एकल न्यायाधीश की पीठ ने 5 नवंबर, 2024 को उसकी याचिका स्वीकार कर ली और उसे एक लाख रुपये के निजी मुचलके और 50-50 हजार रुपये के दो जमानतदार पेश करने पर रिहा करने का निर्देश दिया। उस समय तक, वह अपनी चार साल की सजा में से 3 वर्ष, दो महीने और 20 दिन की सजा काट चुका था।
उच्च न्यायालय के आदेश में निर्धारित शर्तों का पालन करने के बावजूद, उसे पच्चीस नवंबर 2024 तक रिहा नहीं किया गया। इसके बाद उसने खंडपीठ का रुख किया, जिसने 6 दिसंबर 2024 को उसकी तत्काल रिहाई का आदेश दिया।
इसके बाद उस व्यक्ति ने अवैध हिरासत के लिए मुआवजे का अनुरोध करते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर की।
अदालत ने कहा, 'हमारा यह दृढ़ मत है कि अपीलकर्ता प्रतिवादी राज्य द्वारा 24 दिनों तक अवैध हिरासत में रखे जाने के लिए मुआवजे का हकदार है। किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता कोई मामूली बात नहीं है।'
अदालत ने कहा, ‘‘राज्य केवल इस वजह से किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में कटौती नहीं कर सकता कि उसकी नौकरशाही प्रक्रिया धीमी है और वह यह तय करने में समय ले रहा है कि किसी मामले में अपील दायर करनी है या नहीं।’’
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिरासत में रहे किसी व्यक्ति की रिहाई का आदेश होने पर उसका हर हाल में पालन किया जाना चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि केवल उसी स्थिति में रिहाई रोकी जा सकती है, जब किसी उच्चतर अदालत ने उस आदेश पर रोक लगा दी हो।
भाषा
अमित दिलीप
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