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प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति मित्थल के योगदान को सराहा

नयी दिल्ली, 29 मई (भाषा) प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायपालिका के प्रति न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति पंकज मित्थल के योगदान की शुक्रवार को सराहना की तथा उन्हें विदाई दी।

न्यायमूर्ति माहेश्वरी (जो 28 जून को अपना पद छोड़ देंगे) और न्यायमूर्ति मित्थल (जो 16 जून को सेवानिवृत्त हो जाएंगे) के लिए शुक्रवार अंतिम कार्य दिवस था। उच्चतम न्यायालय में एक जून से 12 जुलाई तक आंशिक कार्य दिवस होंगे।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि न्यायपालिका में विदाई शायद ही कभी आसान होती है, और ऐसे क्षण तब और भी कठिन हो जाते हैं जब दो न्यायाधीश—जिन्होंने संस्थान में अपने-अपने विशिष्ट और सार्थक तरीकों से योगदान दिया है—एक साथ सेवानिवृत्त हो रहे हों।

उन्होंने कहा, ‘‘इसलिए आज की शाम गहरी कृतज्ञता और चिंतन के भाव से भरी है, क्योंकि हम न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और न्यायमूर्ति पंकज मित्थल को न्यायिक सेवा में उनके लंबे एवं सफल कार्यकाल के बाद विदाई दे रहे हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने अदालत परिसर में विदाई समारोह का आयोजन करने के लिए ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन’ (एससीबीए) को धन्यवाद दिया।

न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि इससे उन्हें उन सहयोगियों के बारे में बोलने का मौका मिलता है, जिन्होंने इस संस्था में न केवल कानूनी सूझबूझ, बल्कि दृढ़ विश्वास और उद्देश्य के प्रति अटूट निष्ठा की भावना भी लाई।

पिछले साल न्यायमूर्ति माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने तमिलनाडु के करूर में हुई भगदड़ की सीबीआई जांच के आदेश दिये थे, जिसमें 41 लोग मारे गए थे। पीठ ने कहा था कि इस घटना ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया है और निष्पक्ष और तटस्थ जांच की हकदार है।

न्यायमूर्ति मित्थल, जिन्होंने कई उल्लेखनीय फैसले दिए हैं, सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने यह माना कि राज्यों को अनुसूचित जातियों (एससी) के भीतर उप-वर्गीकरण करने का संवैधानिक अधिकार है।

न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने बार एसोसिएशन के समर्थन की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने अपने कानूनी सफर की शुरुआत मध्यप्रदेश से की तथा आंध्र प्रदेश और सिक्किम उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश बने, जहां उन्होंने विभिन्न संस्कृतियों, भूभागों और भाषाओं को देखा, लेकिन न्याय पाने की आम आदमी की आकांक्षा में कोई बदलाव नहीं आया।

उन्होंने कहा, ‘‘इस संस्था का अपना एक अलग ही महत्व है। यहां मैंने सर्वश्रेष्ठ कानूनी प्रतिभाओं को उभरते देखा। मैं इस बार (वकील समुदाय) के जुनून और रचनात्मकता को बहुत याद करूँगा।’’

न्यायमूर्ति मित्थल ने कहा कि मामलों की बढ़ती संख्या महज एक सांख्यिकीय मुद्दा या प्रशासनिक चिंता का विषय नहीं है; यह सीधे तौर पर उन लाखों नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और आकांक्षाओं को प्रभावित करती है, जो आशा और विश्वास के साथ अदालतों का रुख करते हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘हर लंबित मामला एक मानवीय कहानी है, जिसका समाधान होना बाकी है, एक पारिवारिक विवाद, लंबे समय से चली आ रही पीड़ा, एक विचाराधीन कैदी जो रिहाई की प्रतीक्षा कर रहा है, आजीविका को प्रभावित करने वाला एक वाणिज्यिक मामला या संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा चाहने वाला एक नागरिक।’’

भाषा

राजकुमार दिलीप

दिलीप