नयी दिल्ली, 29 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने यहां 1984 के हत्या के मामले में एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन यह देखते हुए उसकी रिहाई का आदेश दिया कि वह 18 वर्षों से अधिक समय से जेल में है तथा इस मामले में उसके साथ सजा पाए दोषियों को छूट दी जा चुकी है।
न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पीठ ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए अपीलकर्ता गोपी चंद को दी गई सजा को उसके द्वारा भुगती जा चुकी सजा की अवधि तक संशोधित किया।
यह मामला जुलाई 1984 का है, जब गोपी चंद और उसके भाई सहित पांच लोगों ने एक ट्रक चुराने की साजिश रची और कद्दू ले जाने के बहाने भाड़े पर एक ट्रक लिया।
यात्रा के दौरान समूह ने ट्रक के चालक और खलासी की हत्या कर दी, उनके शवों को राष्ट्रीय राजधानी के अलीपुर और सिविल लाइंस में फेंक दिया और ट्रक चुरा लिया।
इस घटना के सिलसिले में पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें से एक सरकारी गवाह बन गया। उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान गोपी चंद के वकील ने दावा किया कि गवाह की गवाही अविश्वसनीय थी और उसने दोष दूसरों पर डालने की कोशिश की।
इस तर्क को खारिज करते हुए पीठ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि गवाह ने खुद को भी यह बताते हुए दोषी जाहिर किया कि उसने उन घटनाओं में भाग लिया था जिनके कारण अंततः हत्या हुई।
अदालत ने कहा कि गवाह ने बताया कि उसने बेहोश करने के लिए एक व्यक्ति का पैर पकड़ा ताकि वे ट्रक चुरा सकें।
अदालत ने कहा, ‘‘गोपी चंद पहले ही 18 साल से अधिक की सजा भुगत चुका है। हालांकि यह घटना 1984 की है और इसमें शामिल अन्य दोषियों को सजा में छूट का लाभ दिया गया है। फिर भी हम अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए, अपीलकर्ता को दी गई सजा को पहले से भुगती गई सजा की अवधि तक संशोधित करना उचित समझते हैं।’’
भाषा संतोष वैभव
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