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सतत विकास में कमजोर वर्ग की चिंताओं का समाधान होना चाहिए: पूर्व प्रधान न्यायाधीश गवई

हैदराबाद, 14 अप्रैल (भाषा) भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश बी आर गवई ने मंगलवार को कहा कि सतत विकास को एक संवैधानिक दृष्टि के रूप में देखा जाना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि विकास मौजूदा असमानताओं को और गहरा न करे, बल्कि उन्हें खत्म करने का काम करे।

उन्होंने पूछा कि यदि विकास के परिणामस्वरूप हाशिये पर पड़े समुदायों का विस्थापन होता है, यदि यह मौजूदा असमानताओं को बढ़ाता है, या यदि यह पहले से ही कमजोर लोगों पर असमान पर्यावरणीय बोझ डालता है, तो क्या इसे टिकाऊ कहा जा सकता है?

उन्होंने यहां नालसार विधि विश्वविद्यालय में 'सतत विकास और वास्तविक समानता: एक संवैधानिक संवाद' विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा, 'जब हम सतत विकास के बारे में सोचते हैं, तो हमें अधिक मूलभूत प्रश्न पूछने होंगे - विकास किसके लिए और किस कीमत पर।'

न्यायमूर्त गवई ने कहा, “इसलिए विकास के प्रति हमारा दृष्टिकोण अधिक गहन अर्थों में दूरदर्शी होना चाहिए। केवल यह सुनिश्चित करना पर्याप्त नहीं है कि भावी पीढ़ियों को संसाधनों तक पहुंच प्राप्त हो। हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें अधिक समान सामाजिक व्यवस्था विरासत में मिले। विकास को ऐतिहासिक असमानताओं को दूर करना चाहिए, न कि उन्हें आगे बढ़ाना चाहिए।”

इसके लिए नीतियों और संस्थानों के स्वरूप पर पुनर्विचार करना आवश्यक है।

भाषा तान्या सुरेश

सुरेश