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शौचालयों की समस्या महिला यात्रियों के लिए गंभीर संकट का कारण

(तान्या अग्रवाल)

नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा)‘‘...कई बार घंटों पेशाब रोक कर रखना पड़ता है, पेट में दर्द हो जाता है। मुझे इसी के चलते एक बार यूटीआई की समस्या तक हो गई थी। कई दिन अस्पताल में रहना पड़ा।’’

ये समस्या दिल्ली निवासी 25 वर्षीय आयुषी जैसी उन हजारों महिलाओं की है जो रोजाना काम के सिलसिले में दिल्ली मेट्रो में लंबी दूरी का सफर तय करती हैं, बड़े और भीड़भाड़ वाले बाजारों में खरीददारी के लिए जाती हैं या जो घर से निकल कर कोई छोटा मोटा कारोबार करती हैं।

शास्त्री पार्क निवासी आयुषी का कहना था कि शहर में शौचालय की कमी और गंदगी के कारण या तो पेशाब रोकना पड़ता है या गंदे शौचालयों का इस्तेमाल करना पड़ता है। इसके कारण उन्हें संक्रमण (वैजाइनल इंफेक्शन) से जूझना पड़ा।

आयुषी ने 'भाषा' से बातचीत में कहा कि हर दिन दफ्तर जाने के लिए उन्हें लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और मजबूरी में कई बार उन्हें गंदे शौचालय भी इस्तेमाल करने पड़ते हैं।

सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गनाइजेशन की राष्ट्रीय निदेशक, नीरजा भटनागर ने ‘भाषा’ को बताया कि उनका संस्थान दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों सहित कुल 430 शौचालयों का संचालन और रखरखाव करता है। प्रति शौचालय 10 कर्मचारी साफ-सफाई के लिए उपलब्ध हैं।

स्नातक की छात्रा दिव्या प्रतिदिन शाहदरा से ग्रीन पार्क तक का सफर मेट्रो से तय करती हैं। दिव्या का कहना था कि कुछ एक बड़े स्टेशनों को छोड़कर दिल्ली मेट्रो के कई स्टेशनों पर शौचालय मेट्रो परिसर के बाहर बने हुए है, जिसके कारण मेट्रो के निकास द्वार से बाहर आना पड़ता है। उन्होंने कहा इससे सफर के किराए में भी वृद्धि होती है और समय बर्बाद भी होता है।

कामकाजी महिला सीमा (36) ने कहा कि मेट्रो स्टेशनों पर शौचालय के इस्तेमाल पर लघु शंका के दो रुपए और दीर्घ शंका के पांच रुपए लेने का नियम है। लेकिन शौचालयों की देखभाल के लिए बैठे कर्मचारी लघु शंका के लिए भी पांच रुपए वसूलते हैं।

उनका कहना था कि इस वजह से भी महिलाएं मेट्रो स्टेशनों पर लघु शंका के लिए शौचालयों का इस्तेमाल नहीं करतीं।

सीमा का कहना था कि शहर के बड़े बाजारों में भी शौचालयों की कमी और उनमें गंदगी के कारण कई बार पेशाब रोक के रखना पड़ता है, जिससे न केवल पेट में दर्द होता है बल्कि स्थिति भी असहज हो जाती है।

दिल्ली के जाफराबाद की निवासी 17 वर्षीय मरियम ने बताया कि उसकी 47 वर्षीय मां प्रतिदिन सुबह से रात तक दुकान संभालती हैं। बाजारों में शौचालयों की कमी और गंदगी के कारण वह काफी समय तक पेशाब रोक कर रखती थी, जिसके कारण उन्हें मूत्र संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ा।

इस सवाल पर कि प्रति 100 महिलाओं पर कितनी शौचालय सीट की जरूरत होती है, नीरजा भटनागर ने कहा कि इसका कोई निश्चित हिसाब नहीं है और यह शहर-दर-शहर अलग-अलग होता है। उनका कहना था, अस्थायी आबादी के लिए स्वच्छ भारत मिशन (एसबीएम) के अनुसार प्रति 100 पुरुषों पर एक सीट और प्रति 100 महिलाओं पर दो सीटें उपलब्ध कराई जाती हैं।

हालांकि उनका कहना था कि राष्ट्रीय राजधानी की महिलाओं की आबादी के हिसाब से 430 शौचालयों की संख्या काफी कम है।

नोएडा के सेक्टर-39 स्थित जिला अस्पताल के वरिष्ठ सलाहकार एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय राणा ने 'भाषा' को बताया कि मूत्र को लंबे समय तक रोककर रखने से तत्काल असहजता होती है और दीर्घकालिक समस्याओं जैसे मूत्र मार्ग संक्रमण (यूटीआई), मूत्राशय की कार्यक्षमता में गड़बड़ी तथा संभावित रूप से किडनी को नुकसान पहुंचने का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि ये जोखिम गर्भवती महिलाओं और उन महिलाओं में अधिक होते हैं, जिन्हें स्वच्छ शौचालय सुविधाओं की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है।

डॉ. राणा ने बताया, 'अल्पकालिक प्रभावों में सबसे सामान्य मूत्र मार्ग संक्रमण (यूटीआई), दर्द और असहजता, मूत्र रुकाव तथा मूत्र असंयम (इनकॉन्टिनेंस) शामिल हैं। दीर्घकालिक प्रभावों में किडनी को क्षति, मूत्राशय की मांसपेशियों को नुकसान, मूत्राशय में पथरी और पेल्विक फ्लोर डिसफंक्शन जैसी समस्याएं हो सकती हैं।'

गर्भवती महिलाओं के संबंध में उन्होंने कहा कि ऐसे में मूत्र रोककर रखना यूटीआई के खतरे को और बढ़ा देता है, जो गर्भावस्था के दौरान विशेष रूप से खतरनाक हो सकता है।

उनका कहना था कि यदि यूटीआई का समय पर इलाज न किया जाए, तो संक्रमण किडनी तक पहुंच सकता है और गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकता है, जिनमें समय से पहले प्रसव, शिशु का कम जन्म वजन, भ्रूण को कष्ट और तीव्र मूत्र रुकाव शामिल हैं।

वैसे भी मासिक धर्म के दौरान, मूत्र रोकने से यूटीआई के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है और वल्वोवैजाइनल संक्रमण का खतरा भी रहता है।

वहीं, यशोदा मेडिसिटी के सीओओ डॉ, सुनील डागर का कहना था कि शौचालय की सुविधा से वंचित महिलाओं में जननांग और मूत्र मार्ग संक्रमण का खतरा सामान्य महिलाओं की तुलना में छह गुना तक अधिक होता है। शौचालय जाने से बचने के लिए कई महिलाएं लंबे समय तक पानी या अन्य तरल पदार्थ नहीं पीतीं, जिससे जनन-मूत्र संबंधी (जेनिटो-यूरिनरी) समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।

नीरजा भटनागर ने स्वीकार किया कि दिल्ली की आबादी को देखते हुए और शौचालयों की जरुरत है।

भाषा तान्या नरेश पवनेश

पवनेश