उत्तर प्रदेश में एक नया नियम लागू हो गया है। जिसकी चर्चा हर जगह हो रही है और तमाम तरिके के सवाल भी इस नियम को लेकर उठाए जा रहे है। दरअसल उत्तर प्रदेश के मुज्जफरनगर में कावड़ यात्रा को लेकर एक नया आदेश जारी हुआ है जिसके तहत सभी दुकानदारों को अब अपने दुकान के बाहर एक बोर्ड पर अपना नाम लिखकर लगाना होगा ताकि ग्राहकों को बताना होगा कि उनका असली और सही नाम क्या है? और ये नियम सभी ढावो, खाने पीने की दुकानों आदि पर लागू होता है, और विशेष रूप से नियम उन दुकानों के लिए लागू होगा जो दुकाने कावड़ यात्रा के मार्ग में पड़ती हैं।
नियम लागू करने के कारण
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से इस नियम को लागू करने के पीछे दो मुख्य कारण बताए गए हैं। जिनमें से पहला है कि लोगों के भ्रम को दुर करना। दरअसल मुजफ्फरनगर में कई सैकड़ों एसी दुकाने है जिनके नामों को सुनकर लगता है कि वे हिंदुओं द्वारा संचालित दुकानें है। लेकिन जब इस बारे में पता लगाया जाता है तो पाया जाता है कि वे किसी अन्य विशेष धर्म से आने वाले व्यक्ति द्वारा संचालित दुकान हैं। जिसके बाद कावड़ यात्रियों और होटल संचालकों के बीच झगड़े होते है और इसी भ्रम को खत्म करने के लिए प्रशासन ने ये बड़ा फैसला लिया है।
इस नियम को लागू करने का एकमात्र उद्देश्य है कि कावड़ यात्रा के दौरान हिन्दू अपनी धार्मिक शुद्धता को सुनिश्चित कर सके. और उन्हें ये पता रहे कि वे किस व्यक्ति की दुकान पर खाना खा रहे हैं और सबसे बड़ी बात ये कि ये नियम सभी धर्मों के लिए लागू किया गया है इसमें कहीं भी ये नहीं लिखा गया है कि ये नियम किसी विशेष धर्म के लिए लागू है।
नेम प्लेट को लेकर विवाद क्यों ?
इस नियम के तहत दुकानदारों और संचालकों को अपना पुरा नाम लिखना होगा। जिसके बाद सवाल ये खड़ा होता है कि क्या पुलिस दुकानदारों के नाम के साथ उनकी जातियां भी जानना चाहती है। जिसकों लेकर भी विवाद हो सकता है।
अगर विपक्ष की बात की जाए तो विपक्ष फिलहाल ये कह रहा है कि इस नियम के तहत मुसलमानों को टारगेट करने का प्रयास किया जा रहा है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव, असदद्दीन औवेसी, कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम धर्मगुरू समेत कई दल इस नियम का विरोध कर रहे है। यहां तक की एनडीए की सहयोगी पार्टी समेत उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ मंत्री भी इसका विरोध कर रहे हैं कि इस फैसले पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।
क्या मुस्लिम विरोधी है नियम ?
प्रशासन के इस फैसले के बाद लगातार विपक्ष ये सवाल उठा रहा है कि ये कानून मुस्लिम विरोधी है। लेकिन सवाल तो ये भी उठता है कि धार्मिक यात्रा के दौरान अगर सरकार की ओर से अगर किसी धर्म की धार्मिक शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम उठाया जाता है तो क्या उस मुस्लिम विरोधी कहना उचित है?
हमारे देश में ही मुस्लिम समुदाय भी अपनी धार्मिक शुद्धता को बरकरार रखने के लिए हलाल सर्टिफाईड प्रोडक्टस का इस्तेमाल करते हैं और ये सब कुछ सरकार की सहमती से होता है और एसा सरकारों द्वारा इसलिए किया जाता है ताकि मुस्लिम धर्म की धार्मिक शुद्धता को बरकरार रखा जा सके। ये उनकी धार्मिक भावनाओं के सम्मान के लिए किया जाता है। लेकिन जब यही सरकार किसी और धर्म के लिए एसे कदम उठाती है तो बड़ी आसानी से उन्हें मुस्लिम विरोधी करार दिया जाता है।