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Meerut: आवासीय प्लॉट पर बनाया कमर्शियल कंपलेक्स, SC ने 90 दिन में ध्वस्त करने के लिए आदेश

आवासीय क्षेत्र के भू उपयोग नियमों में बदलाव कर किए गए निर्माण को अवैध करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे ढहाने का निर्णय दिया है। ये आदेश अभी तो 22 से 24 दुकानों के लिए दिया गया है लेकिन ये आदेश लगभग डेढ़ हजार दुकानों और व्यावसायिक स्थलों को अवैध घोषित कर बुलडोजर चलाने का रास्ता साफ कर देगा ।

दरअसल, मामला मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट का है जहां के व्यापारियों को सुप्रीम कोर्ट से जोरदार झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने अपने निर्णय के जरिए शास्त्री नगर विकास योजना के तहत आवासीय क्षेत्र में सभी कमर्शियल निर्माण को अवैध बताया है। उन्हें ध्वस्त करने का आदेश भी दिया है। कोर्ट ने ऐसे अवैध रूप से बनाए गए भवनों के स्वामियों को परिसर खाली करने के लिए तीन महीने का समय दिया है। इसके 2 सप्ताह बाद आवास एवं विकास परिषद को अवैध निर्माणों को ध्वस्त करना होगा।

आपको बता दे मेरठ में शास्त्री नगर में आवास विकास की ओर से आवासीय योजना के तहत प्लॉट दिए गए थे जिसमें अब लोगों ने वहां पर आवासीय प्लॉट में कमर्शियल कंपलेक्स बना लिए हैं इसके बाद आवास विकास में इनको ध्वस्त करने के लिए नोटिस दिए इसके बाद व्यापारी इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे जहां पर 2013 और 14 में परिसर के ध्वस्थिकरण के आदेश दिए गए इसके बाद व्यापारी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे व्यापारियों का कहना है कि उनको सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने व्यापारियों के खिलाफ फैसला दिया है जिसमें 90 दिन के अंदर परिसर को ध्वस्त करने के आदेश दिए हैं। फिलहाल यह आदेश 22 से 24 दुकानों के लिए दिए गए हैं लेकिन यह आदेश लगभग डेढ़ हजार वहां बनी दुकानों के लिए भी ध्वस्तिकरण का रास्ता साफ कर देगा। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिए आदेश को बहाल रखा है । जिसमें भूखंड 661/6 के अवैध निर्माण के ध्वस्तीकरण आदेश की पुष्टि की है। साथ ही आवासीय क्षेत्र में हुए व्यावसायिक निर्माण को ध्वस्त करने के आदेश दिए हैं।

बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने 19 नवंबर को सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने मेरठ में शास्त्री नगर सेंट्रल मार्केट के 499 भूखंडों के भू-उपयोग की स्टेटस रिपोर्ट आवास एवं विकास परिषद से मांगी थी। इसके बाद परिषद ने शास्त्रीनगर स्कीम-7 और स्कीम-3 में सर्वे करके कुल 1478 आवासीय भूखंडों की रिपोर्ट दी थी। उसमें लिखा था कि आवासीय भूखंडों का भू-उपयोग परिवर्तन कर व्यावसायिक गतिविधि चल रही है। ये प्लॉट आज भी आवास विकास परिषद के रिकॉर्ड में काजीपुर के वीर सिंह के नाम से आवंटित हैं। जबकि 1992 से लेकर 1995 तक इस प्लॉट में बनी दुकानें बेच दी गईं । इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ व्यापारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। शुरू में तो उस आदेश पर कोर्ट ने रोक लगा दी थी पर 10 साल बाद 19 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मामले में आदेश सुरक्षित रखते हुए आवास विकास परिषद से 499 भवनों की स्टेटस रिपोर्ट मांगी थी। परिषद की रिपोर्ट पर कोर्ट ने ये निर्णय दिया है।

वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश आने के बाद स्थानीय दुकानदार अब आगे की तैयारी में लगे हैं उनका कहना है कि अगर दुकान चली गई तो सब कुछ खत्म हो जाएगा उन्होंने गुहार लगाई सरकार से की सरकार इस मामले में दखल दे और कुछ समाधान निकाला जाए।

मीडिया से बात करते हुए किशन वाधवा ने बताया कि जितने भी भूखंड हैं वह आवासीय हैं सब में व्यापारिक गतिविधियां चल रही हैं । सन 2013 में हाई कोर्ट में इसको ध्वस्तीकरण का आदेश दिया था इसके बाद हम सुप्रीम कोर्ट गए तब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई हमें स्टे मिल गया था हमें उम्मीद थी हमारे फेवर में कोई फैसला आएगा सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल विपरीत आर्डर दिया है सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आर्डर को ही मान्य किया है । 3 महीने का टाइम दिया गया है व्यापारियों में आक्रोश है 30 - 32 साल से यहां काम कर रहे हैं हमारे सामने बहुत बड़ी समस्या है। सन 90 से यह कंपलेक्स है अब हम इसमें सलाह कर रहे हैं दोबारा सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू के लिए डाला जाए या सरकार के द्वारा कोई ऐसी योजना लाई जाए कि हमारा बचाव हो जाए । अगर एक बार यह कंपलेक्स टूट गया तो आगे भी सभी दुकान तोड़ी जाएगी सभी प्लॉट आवासीय हैं यहां पर और सभी सेकंड ऑनर हैं जो पहले आवंटन हुए थे वह सब बेच चुके हैं।

जहां कपड़े का काम करने वाले दुकानदार राजीव न कहा कि सालों से दुकान कर रहे हैं इतनी बड़ी आबादी यहां पर है उसमें डेढ़ 2% की दुकान सरकारी छोड़ी गई थी और ऐसी सूरत में आवश्यकता अनुसार यहां पर दुकानें बनाई गई है यह आवास विकास को पता है लेकिन उन्होंने आंखें बंद कर रखी थी।

हम कोर्ट का आदेश मान्य है मान रहे हैं लेकिन सरकार से हमारा कहना है कि वह इसको नियमित करे जितना एरिया है उसको सर्वे कराकर नियमित होना चाहिए। दुकान खत्म होने के बाद तो हमारा रोजगारी खत्म हो जाएगा । संपत्ति भी खत्म हो जाएगी ,लेकिन जो उसे मेहनत करके यहां तक हमने लाए हैं वह सब खत्म हो जाएगा । हमारे जीवन में कुछ शेष नहीं बचेगा हमारे साथ तो कई परिवार जुड़े में है अभी तो यह दुकानों की बात है बाकी इसके अलावा भी यहां बहुत सारी ऐसी ही दुकानें है। हमने तो 2005 के बाद में दुकान खरीदी हैं उसे समय तो दुकान ही थी । हम लोग इनकम टैक्स भी देते हैं सेल टैक्स भी देते हैं कहीं कोई गलत नहीं है केवल प्लॉट के आधार पर आवास विकास के नियम पर आधार पर यह कार्रवाई क्यों हो रही है । वीर सिंह थे उन्होंने यह बनाया है हमें वह नहीं पता हमने तो दुकान ही खरीदी थी।

आज की डेट में लगभग 2 करोड़ के आसपास की एक दुकान है व्यापारियों के पास तो सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाने का कोई नहीं है आत्महत्या ही कर लेंगे।

वहीं इस पूरे मामले में आवास विकास के अधिकारी राजीव कुमार का कहना है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का जो आदेश किया है जिसमें 2013 में जो मान्य उच्च न्यायालय ने जो हाईकोर्ट ने जो आदेश दिया था उसका ही माना है। 2013 का जो आदेश है वही माननीय है उसी के अनुसार कार्रवाई की जाएगी 90 दिन का टाइम दिया गया है हमारे पास अभी तक सुप्रीम कोर्ट का आदेश नहीं आया है वह आदेश हम निकलवा रहे हैं। उसके बाद में देखा जाएगा आदेश के हिसाब से आगे की कार्रवाई की जाएगी।