राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देश की सदियों पुरानी बुनाई परंपराओं और उन्हें आगे बढ़ाने वाले कारीगरों को सम्मानित किया। राष्ट्रपति भवन सांस्कृतिक केंद्र (RBCC) में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने संत कबीर हथकरघा पुरस्कार और राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार 2025 प्रदान किए। इस वर्ष कुल 22 उत्कृष्ट बुनकरों, डिजाइनरों, सहकारी समितियों और उद्यमियों को उनके शानदार काम के लिए सम्मानित किया गया। इन पुरस्कारों का उद्देश्य बेहतरीन कारीगरी, नए प्रयोग और भारत की समृद्ध हथकरघा विरासत को बचाने में योगदान देने वालों को सम्मान देना है। इस साल तीन कारीगरों को संत कबीर हथकरघा पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसे हथकरघा क्षेत्र के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक माना जाता है।
-
ओडिशा के राम मेहर को बिचितपाड़ खादी साड़ी की बुनाई के लिए सम्मान मिला।
-
असम की रुनिमा चेतिया चौधरी को मुगा सिल्क साड़ी के लिए पुरस्कार दिया गया।
-
उत्तर प्रदेश के शाह मोहम्मद अंसारी को दुर्लभ जरबफ्त श्वेतांबरी अवध जमदानी साड़ी के लिए सम्मानित किया गया।
राष्ट्रीय हथकरघा पुरस्कार की अलग-अलग श्रेणियों में 19 लोगों को सम्मानित किया गया। इनमें तमिलनाडु की कांचीपुरम सिल्क साड़ी, तेलंगाना की इकत साड़ी, आंध्र प्रदेश की कॉटन टसर हाफ-एंड-हाफ जमदानी साड़ी, मध्य प्रदेश की माहेश्वरी साड़ी, जम्मू-कश्मीर की कानी शॉल और पश्चिम बंगाल की 500-काउंट खादी मलमल जमदानी साड़ी बनाने वाले कारीगर शामिल हैं। इसके अलावा महिला बुनकरों, युवा बुनकरों, आदिवासी बुनाई, दिव्यांग बुनकरों और लुप्त होती बुनाई परंपराओं को दोबारा जीवित करने वाले कारीगरों को भी विशेष श्रेणियों में सम्मानित किया गया।
पुरस्कार केवल बुनाई तक सीमित नहीं रहे। तमिलनाडु के गोपीनाथन एमवी और पश्चिम बंगाल के मंटू बासक को डिजाइन विकास के लिए सम्मानित किया गया। वहीं, आंध्र प्रदेश के एन. वेंकटेश्वर राव और तमिलनाडु की CH-31 कोविलवाझी हैंडलूम वीवर्स कोऑपरेटिव सोसाइटी को हथकरघा उत्पादों की मार्केटिंग के क्षेत्र में सम्मान मिला। असम की मार्वेला एसोसिएट्स को स्टार्टअप वेंचर्स/प्रोड्यूसर कंपनी श्रेणी में पुरस्कार दिया गया।
इन पुरस्कारों से 13 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कारीगरों को सम्मान मिला। इनमें ओडिशा, असम, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मणिपुर, राजस्थान, गुजरात और सिक्किम शामिल हैं। हर साल 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस मनाया जाता है। यह दिन 1905 में शुरू हुए स्वदेशी आंदोलन की याद में मनाया जाता है। हथकरघा क्षेत्र भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के साथ-साथ ग्रामीण रोजगार और लाखों बुनकर परिवारों की आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इन पुरस्कारों के जरिए उन कारीगरों के योगदान को सामने लाया गया है, जो पारंपरिक तकनीकों और सदियों पुरानी बुनाई की कला को आज भी जीवित रखे हुए हैं।