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62 वर्षीय पायलट को 15 साल बाद बड़ी राहत, बंबई हाई कोर्ट ने DGCA के फैसले को पलटा

Mumbai: बंबई उच्च न्यायालय ने 62 वर्षीय एक पायलट को बड़ी राहत देते हुए 2011 में नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा उनके लाइसेंस को निलंबित करने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह आदेश ‘‘अवैध और कानूनी रूप से असंगत’’ था क्योंकि पायलट को सुनवाई का अवसर दिए बिना यह फैसला लिया गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

डीजीसीए ने 12 मार्च 2011 को जीतेंद्र कृष्ण वर्मा के एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (एटीपीएल) को निलंबित कर दिया था। एटीपीएल पायलट लाइसेंस का सर्वोच्च स्तर माना जाता है। यह कार्रवाई दिल्ली में उनके खिलाफ दर्ज एक प्राथमिकी के बाद की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उन्होंने जाली दस्तावेजों के आधार पर यह लाइसेंस हासिल किया था।

उस समय 46 वर्षीय वर्मा ने विमान नियमों के तहत अपने लाइसेंस के निलंबन को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय का रुख किया था। न्यायमूर्ति मनीष पितले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसाट की पीठ ने सोमवार को दिए अपने फैसले में कहा कि डीजीसीए के लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने न तो वर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी किया और न ही लाइसेंस निलंबित करने से पहले उन्हें व्यक्तिगत रूप से सुनवाई का अवसर दिया।

अदालत ने कहा, ‘‘हमें लगता है कि याचिकाकर्ता (वर्मा) के साथ निश्चित रूप से अन्याय हुआ है, क्योंकि वह अपना पक्ष नहीं रख सके। इसलिए हम लाइसेंस निलंबन के आदेश को रद्द करते हैं और मामले को डीजीसीए के पास वापस भेजते हैं ताकि याचिकाकर्ता को सुनवाई का अवसर दिया जा सके, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होगा।’’ पीठ ने यह भी उल्लेख किया कि 2011 में प्राथमिकी दर्ज होने और आरोपपत्र दाखिल किए जाने के बावजूद आज तक वर्मा के खिलाफ आरोप तय नहीं किए गए हैं।

उच्च न्यायालय ने कहा, ‘‘यह आदेश (लाइसेंस निलंबन) अवैध और कानूनी रूप से असंगत है, इसलिए इसे रद्द किया जाता है। याचिकाकर्ता को जारी किया गया एटीपीएल लाइसेंस बहाल किया जाता है।’’ वर्मा की याचिका के अनुसार, उन्हें दिसंबर 1988 में कमर्शियल पायलट लाइसेंस जारी किया गया था, जिसका समय-समय पर नवीनीकरण होता रहा। वह एअर इंडिया में कार्यरत थे और नियमित रूप से उड़ानों का संचालन करते थे। वर्ष 2010 में वह एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस (एटीपीएल) पाने के पात्र हो गए।

आवश्यक परीक्षा पास करने के बाद उन्हें यह लाइसेंस जारी कर दिया गया। मार्च 2011 में दिल्ली में एक शिकायत दर्ज कराई गई, जिसमें आरोप लगाया गया कि वर्मा ने जाली दस्तावेजों के आधार पर एटीपीएल प्राप्त किया है। उसी महीने उन्हें गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में जमानत मिल गई। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद डीजीसीए ने उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया। डीजीसीए का तर्क था कि वर्मा ने जाली दस्तावेजों के आधार पर एटीपीएल हासिल किया था और जन सुरक्षा के हित में उनका लाइसेंस निलंबित किया गया।

वर्मा ने अपनी याचिका में कहा कि डीजीसीए ने लाइसेंस निलंबित करने से पहले न तो उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर प्रदान किया। उन्होंने कहा कि यह नियमों के विपरीत था। वर्मा के अनुसार, लाइसेंस निलंबित होने के बाद उनकी नौकरी भी समाप्त कर दी गई थी। उन्होंने सेवा समाप्ति आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। फरवरी 2019 में उच्च न्यायालय ने उनकी बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया था।