Breaking News

ईरान ने अमेरिका के साथ डिप्लोमैटिक बातचीत बंद की     |   अगले 48 घंटे सावधान रहें: भारत सरकार का ईरान में रह रहे भारतीयों को संदेश     |   आज रात एक पूरी सभ्यता खत्म हो जाएगी: ट्रंप की ईरान को बड़ी धमकी     |   ईरान का पलटवार, इजरायल पर पहली बार बाइपॉड लॉन्चर्स से वार, शारजाह पर भी अटैक     |   ईरान: करज शहर में बिजली ठप, हमले में ट्रांसमिशन लाइनों पर गिरे प्रोजेक्टाइल     |  

क्या है अब्राहम समझौता? ट्रंप क्यों चाहते हैं कि सऊदी अरब और सीरिया हों शामिल?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार को सऊदी अरब में सीरिया के अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शरा से मुलाकात की और उनसे इजराइल के साथ संबंधों को सामान्य बनाने का आग्रह किया। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारे की ये घटना महत्वपूर्ण थी। ट्रंप ने कहा कि अल-शरा अब्राहम समझौते में शामिल होने और इजराइल को मान्यता देने के लिए तैयार हैं। हालांकि सीरिया ने इसकी तस्दीक नहीं की है।

ट्रंप ने मंगलवार को रियाद में उम्मीद जताई कि सऊदी अरब जल्द अब्राहम समझौते में शामिल होगा और इजराइल को मान्यता देगा। उन्होंने कहा कि ये काम उनके कार्यकाल में ही होगा। सऊदी अरब अर्से से कहता आया है कि इजराइल को मान्यता 1967 में फिलिस्तीन के गठन के समय तय सीमा को स्वीकार करने से जुड़ा है। अब्राहम समझौता 2020 में अमेरिकी मध्यस्थता से हुआ था। समझौते के बाद इजराइल, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, सूडान और मोरक्को सहित कई अरब देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य हुए। 

अब्राहम समझौते से मध्य-पूर्व की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ। समझौते में शामिल देशों ने इजराइल-फिलिस्तीन विवाद की परवाह किए बिना इजराइल को मान्यता दी थी। समझौते का नाम अब्राहम रखा गया, जिन्हें यहूदी, ईसाई और इस्लाम में सम्मान के साथ देखा जाता है। वे तीनों धर्मों को एक सूत्र में बांधते हैं। समझौते का मकसद व्यापार, प्रौद्योगिकी, सुरक्षा और पर्यटन के क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना और किसी भी खतरे का मिल कर सामना करना था।

अब्राहम समझौते का महत्व क्षेत्रीय गठबंधनों को नया स्वरूप देना और उनके लिए नए आर्थिक मोर्चे खोलना है। जानकारों का मानना है कि इस समझौते से भारत, मध्य-पूर्व और यूरोप के बीच करीबी सहयोग हो सकता है, जिससे भारत को भी फायदा पहुंच सकता है।