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सुनीता विलियम्स: अंतरिक्ष में फहराया कामयाबी का परचम, सबसे ज्यादा स्पेसवॉक करने वाली महिला बनीं, मैराथन भी दौड़ीं

अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और पूर्व अमेरिकी नौसेना अधिकारी सुनीता लिन विलियम्स अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर नौ महीने से ज्यादा वक्त बिताने के बाद धरती पर लौट आईं। 19 सितंबर, 1965 को ओहियो के यूक्लिड में जन्मी विलियम्स मैसाचुसेट्स के नीडहम में पली-बढ़ीं। उनके पिता दीपक पांड्या मूल रूप से गुजरात के झुलासन गांव के रहने वाले थे।वे 1957 में अमेरिका चले गए थे। वहीं उनकी मां उर्सुलाइन बोनी पंड्या स्लोवेनियाई मूल की हैं।

विलियम्स भले ही अमेरिका में पली-बढ़ीं लेकिन वे भारतीय संस्कृति से जुड़ी रहीं। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब वे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन गईं तो अपने साथ भगवद् गीता की एक प्रति, समोसे का एक पैकेट और भगवान गणेश की एक मूर्ति भी ले गईं। अमेरिकी नौसेना अकादमी से स्नातक सुनीता ने 2017 में रिटायर होने से पहले नौसेना के हेलीकॉप्टर पायलट के रूप में काम किया। उन्होंने 30 विमानों में 3,000 से ज्यादा घंटे उड़ान भरने का अनुभव हासिल किया।

1998 में नासा की अंतरिक्ष यात्री के रूप में चुनी गईं सुनीता विलियम्स ने 2006 में अपने पहले स्पेस-वॉक के साथ इतिहास रच दिया। इतना ही नहीं वे 2007 में अंतरिक्ष में मैराथन दौड़ने वाली पहली शख्स बनीं। विलियम्स नौ बार स्पेस वॉक यानी अंतरिक्ष में चहलकदमी कर चुकी हैं। साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बाहर 62 घंटे बिताए हैं। ये खास उपलब्धियां उन्हें नासा के सबसे कुशल अंतरिक्ष यात्रियों में शुमार करती हैं।

अपने पूरे करियर के दौरान सुनीता विलियम्स को कई पुरस्कारों से भी नवाजा गया। इनमें नौसेना प्रशस्ति पदक और नासा स्पेसफ़्लाइट पदक शामिल हैं। 2008 में, अंतरिक्ष अन्वेषण में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 
 
सुनीता विलियम्स और बुच विल्मोर बोइंग और नासा के सात दिन के मिशन पर अंतरिक्ष में गए थे। हालांकि तकनीकी गड़बड़ी की वजह से दोनों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में नौ महीने से ज्यादा वक्त बिताना पड़ा। बोइंग की असफल परीक्षण उड़ान से शुरू हुआ उनका नाटकीय सफर अब स्पेसएक्स अंतरिक्ष यान पर उनकी वापसी के साथ खत्म हुआ।