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देशभर में संत संसद की जरूरत: निरंजन स्वामी बोले—'बिहार, असम और दक्षिण भारत पर हो खास ध्यान'

 

जयपुर में आयोजित ‘संत संसद 2026’ में आस्था के साथ देशप्रेम का विशेष संगम देखने को मिला। इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन नेटवर्क 10 न्यूज चैनल द्वारा किया गया। शुरुआत में संतों ने अमर जवान ज्योति पर पहुंचकर शहीदों को नमन किया। वहीं, महिलाओं ने कलश यात्रा के जरिए संतों का जोरदार स्वागत किया। कार्यक्रम में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे और उन्होंने नेटवर्क 10 की इस पहल की सराहना की। 

इस विशेष कार्यक्रम में महामनीषी निरंजन स्वामी जी भी शामिल हुए। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि गुवाहाटी में भी संत संसद का आयोजन किया जा सकता है और असम सहित पूर्वोत्तर भारत में इसकी विशेष आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि जहां उत्तर प्रदेश, गुजरात और जयपुर जैसे क्षेत्रों में इस तरह के आयोजनों की कम जरूरत है, वहीं बिहार, असम और दक्षिण भारत के क्षेत्रों में संत सम्मेलनों का आयोजन अधिक होना चाहिए।

स्वामी जी ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि संत सम्मेलन केवल उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों तक ही सीमित क्यों रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे मंचों का विस्तार होना चाहिए, ताकि व्यापक स्तर पर आध्यात्मिक संवाद स्थापित हो सके।

अपने संबोधन में उन्होंने Network10 के एडिटर-इन-चीफ संजय गिरी का भी उल्लेख किया और उनके प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि जहां बड़े टीवी चैनलों पर संतों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता, वहीं संजय गिरी ने सभी संतों को एक मंच पर लाकर संत संसद का सफल आयोजन किया है। उन्होंने उनके लिए ईश्वर से शक्ति और क्षमता की कामना भी की।

निरंजन स्वामी जी ने समाज में जाति व्यवस्था पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि संविधान में सैकड़ों जातियां और उपजातियां दर्ज हैं और आरक्षण भी जाति के आधार पर दिया जाता है, लेकिन समाज को इससे ऊपर उठने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि उनके मठ और मंदिरों में साधुओं के बीच किसी भी प्रकार की जाति व्यवस्था नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म की मूल अवधारणा वर्ण व्यवस्था पर आधारित रही है।

उन्होंने छुआछूत जैसी कुरीतियों से दूर रहने का आह्वान किया और कहा कि समाज को समानता और समरसता की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के तवांग मठ का उदाहरण दिया, जहां बड़ी संख्या में बौद्ध भिक्षु एक साथ रहते हैं। उन्होंने कहा कि हमें यह समझने की जरूरत है कि बौद्ध धर्म ने वैश्विक स्तर पर अपनी परंपराओं को कैसे संरक्षित रखा है। अंत में उन्होंने जोर दिया कि संत समाज को एकजुट होकर देशभर में ऐसे आयोजनों का विस्तार करना चाहिए, ताकि आध्यात्मिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को और अधिक मजबूती मिल सके।