फर्जी इंटरैक्टिव वॉयस रिस्पांस यानी आईवीआर कॉल के जरिए लोगों को फर्जीवाड़े का शिकार बनाने के मामले दिनों-दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। स्वचलित कॉल से घोटालेबाज लोगों को धोखे में रखकर संवेदनशील बैंकिंग डिटेल्स जान लेते हैं जिससे काफी आर्थिक नुकसान होता है। वे बैंकों, सरकारी एजेंसियों या किसी और कंपनी का एजेंट बनकर कॉल करते हैं, और उनकी बातचीत से वो कॉल असली जैसी लगती है। घोटालों के पुराने तरीकों के अलावा आईवीआर सिस्टम से फर्जीवाड़े के मामले काफी बढ़ गए हैं।
इन फर्जी आईवीआर घोटालों को कैसे अंजाम दिया जाता है और लोग इनसे खुद को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं, ये आप सिक्योरिटी एक्सपर्ट से समझिए
दुनिया भर के देशों की सरकारें और साइबर सुरक्षा एजेंसियां कानूनी उपायों और तकनीक के माध्यम से आईवीआर घोटालों से निपट रही हैं। भारत में धोखाधड़ी वाले मामले आईवीआर कॉल सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम- 2000 और बैंकिंग धोखाधड़ी नियमों के तहत आते हैं।
बैंकों के अधिकारी लगातार ग्राहकों को कॉल पर संवेदनशील जानकारी साझा न करने की चेतावनी देते हैं। बावजूद इसके साइबर अपराधी फर्जीवाड़ा करने से बाज नहीं आ रहे हैं। इस खतरे से निपटने के लिए बैंक और दूरसंचार कंपनियां एआई-संचालित धोखाधड़ी का पता लगाने और कॉल वेरिफिकेशन सिस्टम लागू कर रही हैं।
बैंक के अधिकारी इन घोटालों से निपटने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि फर्जीवाड़े से बचने के लिए सबसे ज्यादा ग्राहक को जागरूक होना रहता है। फर्जीवाड़े से बचने के लिए कभी भी कॉल पर ओटीपी, सीवीवी या पिन साझा न करें क्योंकि बैंक और वित्तीय संस्थान कभी भी आईवीआर के जरिए डिटेल्स जानने की कोशिश नहीं करते हैं।
यदि आपको कोई संदिग्ध आईवीआर कॉल आती है, तो हमेशा अपने बैंक के कस्टमर केयर नंबर पर फोन कर पुष्टि कर लें। साइबर अपराध पोर्टलों पर घोटालों की रिपोर्ट करने से अधिकारियों को धोखेबाजों पर नज़र रखने और ऐसे अपराधों को रोकने में मदद मिलती है। कॉल-ब्लॉकिंग ऐप्स का उपयोग करना और मल्टी-फैक्टर वेरिफिकेशन भी फर्जीवाड़े को रोकने में काफी सहायक होते हैं।