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CM योगी के नाम से PM को भेजा फर्जी पत्र, दोषी आरोपी गिरफ्तार

दिल्ली की एक अदालत ने एक व्यक्ति को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फर्जी पत्र भेजने के मामले में दोषी ठहराया है। इस पत्र में आरोपी ने 2019 के उत्तर प्रदेश विधानसभा उपचुनाव में खुद के लिए बीजेपी का टिकट मांगा था। 30 मार्च को राउज एवेन्यू कोर्ट की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ज्योति माहेश्वरी ने अपने विस्तृत फैसले में आरोपी शिवाजी यादव को भारतीय दंड संहिता की धारा 465 (जालसाजी) और 471 (जाली दस्तावेज को असली के रूप में इस्तेमाल करना) के तहत दोषी पाया।

यह मामला 10 जून 2019 के एक पत्र से जुड़ा है, जो कथित तौर पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया था। इसमें शिवाजी यादव को लखनऊ कैंट विधानसभा सीट से बीजेपी का टिकट देने की सिफारिश की गई थी। जांच में सामने आया कि यह पत्र फर्जी था और इसे प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) भेजा गया था।

अदालत ने पाया कि उसी डिस्पैच नंबर वाला एक असली पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय से विदेश मंत्रालय को भेजा गया था, लेकिन PMO को भेजा गया पत्र पूरी तरह से फर्जी था। अभियोजन पक्ष ने साबित किया कि फर्जी पत्र के कुछ हिस्से—जैसे तारीख, डिस्पैच नंबर और लिफाफे का विवरण—आरोपी की ही लिखावट में थे। फोरेंसिक जांच और गवाहों के बयानों से यह भी पुष्टि हुई कि यह पत्र मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी नहीं हुआ था और उस पर योगी आदित्यनाथ के असली हस्ताक्षर नहीं थे।

इसके अलावा, पत्र और लिफाफे में दिए गए मोबाइल नंबर आरोपी से जुड़े पाए गए। लोकेशन डेटा से भी यह साबित हुआ कि पत्र भेजे जाने के समय आरोपी जौनपुर के बदलापुर में मौजूद था। आरोपी ने खुद को निर्दोष बताते हुए फंसाए जाने का दावा किया और यह भी कहा कि मुख्यमंत्री को गवाह के रूप में पेश नहीं किया गया। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया और कहा कि जालसाजी के अपराध में केवल हस्ताक्षर का प्रमाण जरूरी नहीं होता, बल्कि दस्तावेज के किसी भी हिस्से में धोखाधड़ी करना ही पर्याप्त है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने सबूतों की पूरी कड़ी स्थापित कर दी है—फर्जी दस्तावेज तैयार करना, उसे भेजना और PMO तक उसका पहुंचना—जिससे आरोपी की दोषसिद्धि में कोई संदेह नहीं बचता। अंत में अदालत ने शिवाजी यादव को दोषी ठहराते हुए कहा कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के नाम का दुरुपयोग कर फर्जी दस्तावेज बनाना जनता के विश्वास को कमजोर करता है और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।